How to wipe out Islamic terror

Posted: January 14, 2013 in tRuTH Of LigHt

जुलाई 13,2011 को मुसलिम आतंकवादियों द्वारा

किए गए बम धमाकों के बाद हिन्दूओं को निर्णायक रूप से अपनी अन्तरात्मा को झकझोरने की जरूरत है।

भारत का विनाश करने के लिए, मुसलिम आतंकवादियों द्वारा हिन्दूओं का हलाल तरीके से आए दिन खून बहाया जाना,

हिन्दूओं द्वारा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

आतंकवाद गैर कानूनी तरीके से ताकत के दुरूपयोग का वो हथियार है, जिससे आम जनता को भयभीत कर, उसे आतंकवादियों

की इच्छा के विपरीत काम करने से रोकने व आतंकवादियों की नजाजय मांगो को समर्थन देने के लिए मजबूर करने के लिए

उपयोग किया जाता है

भारत में हर महीने लगभग 40 आतंकवादी हमले होते हैं।इसीलिए हाल ही में अमेरिका के ‘आतंकवाद विरोधी केन्द्र’ के प्रकाशन

‘A Chronology of International Terrorism ’ में बताया गया है कि आज तक जितने आतंकवादी हमले भारत पर हुए हैं उतने

आतंकवादी हमले दुनिया के किसी भी देश ने नहीं झेले हैं।

वेशक प्रधानमन्त्री माओवादी हिंसा को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बतायें लेकिन मेरा मानना है कि आज इस्लामिक

आतंकवाद देश के लिए सबसे गम्भीर खतरा है।अगर बर्तमान गृहमन्त्री, प्रधानमन्त्री और UPA अध्यक्ष को आज हटा दिया जाए

तो माओवादी हिंसा को एक महीन में उसी तरह समाप्त किया जा सकता है जिस तरह मैंने 1991 में बरिष्ठ मन्त्री के पद पर

रहते हुए तमिलनाडु में LTTE व MGR ने 1980 में नक्सलवादियों को किया।मुसलिम आतंकवाद देश के लिए एक अलग तरह

का खतरा है।

मुसलिम आतंकवाद हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्यों है? इसके वारे में 2012 के बाद किसी के मन में कोई

शंका नहीं रहेगी। 2012 में तालिवान पाकिस्तान पर कब्जा कर लेंगे व अमेरिका अफगानिस्तान छोड़ कर भाग जाएगा। उसके

बाद इस्लाम अपने अधूरे काम को पूरा करने के लिए हिन्दूत्व से सीधी लड़ाई लड़ेगा। अलकायदा का नया सरगना, जो कि

ओसामाविन लादेन का उताधिकारी है पहले ही घोषणा कर चुका है कि मुसलिम आतंकवादियों का सबसे बड़ा लक्ष्य भारत है न

कि अमेरिका।

कट्टरपंथी मुसलमान हिन्दूबहुल भारत को ‘इस्लामी विजय का एक अधूरा अध्याय’ मानते हैं। हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि

दुनिया के वाकी सभी वो देश, जिन पर इस्लाम ने विजय प्राप्त की , इस्लामी आक्रमण के दो दशकों के भीतर 100% इस्लाम

में परिवर्तित हो गए। भारत एक अपबाद है । 800 वर्षों के अत्याचारी  बरबर मुसलिम शासन के बाद भी अविभाजित भारत में

75% हिन्दू अबादी थी। कट्टरपंथी मुसलमानों को यही बात आज तक सता रही है कि मुसलमानों द्वारा किए गए वेहिसाब जुल्मों

के बाबजूद वो मुसलिम आतंकवादी हिन्दूओं का मनोबल तोड़ने में क्यों सफल न हो पाए।

हर दंगे के बाद नियुक्त किए गए जांच आयोगों की रिपोर्टों के अधार पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1947 से लेकर आज

तक जितने भी हिन्दू-मुसलिम दंगे हुए हैं उन सबकी शुरूआत कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा ही की गई—यहां तक कि गुजरात दंगों

की शुरूआत भी कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा गोधरा में 56 हिन्दू महिलाओं और बच्चों को जिन्दा जलाकर की गई।

आज की परिभाषा के अनुसार मुसलिम आतंकवादियों द्वारा किए गए ये सबके सब हमले आतंकवादी गतिविधियां हैं। वेशक

भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं लेकिन फिर भी कट्टरपंथी हिंसक मुसलमान हिन्दूओं पर जानलेवा हमले करने का दुशसाहस

करते हैं। भारत के अन्य मुसलमान इन हमलों को या तो मौन स्वीकृति देते हैं या फिर इनमें कूद पड़ते हैं या फिर हिन्दूओं के

मारे जाने का तमाशा देखते हैं। भारत में अत्याचारी बाबर से लेकर कातिल औरंगजेब तक और औरंगजेब से लेकर आज तक

हिन्दूओं का कत्लयाम ही मुसलमानों का ईतिहास है। हिन्दूओं पर मुसलिम आतंकवादियों द्वारा किए जाने हमलों के प्रति

उदासीन रहने में ,भूतकाल में दारा सिकोह व वर्तमान में एम जे अकबर व सलमान हैदर जैसे लोग, जो मुसलिम आतंकवाद के

विरूद्ध खुलकर वोलने से नहीं डरते हैं,अपबाद हैं

कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा किए जाने वाले हमलों के लिए हिन्दू ही दोशी हैं।

कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा हिन्दूओं को निशाना बनाए जाने के लिए मैं मुसलमानों के बजाए हिन्दूओं को ही दोष देता हूं। में इन

हमलों का दोष उन हिन्दूओं को देता हूं जिन्होंने सनातन धर्म में बाताई गई आत्मा और पतमात्मा की अबधारणा को चरम पर

ले जाते हुए खुद को अपने आप तक सीमित कर लिया। लाखों हिन्दू विना किसी सरकारी सहयोग के अपने आप को व्यबस्थित

कर कुम्भ मेले में ईकट्ठे हो सकते हैं ,लेकिन मेले के बाद ये सब हिन्दू कशमीर,मऊ, मेल्विशरम और मलप्पुरम व अन्य विधर्मियों

के बहुमत वाले इलाकों में हिन्दूमिटाओ-हिन्दूभगाओ अभियान के तहत मुसलमानों द्वारा निशाना बनाए जा रहे हिन्दूओं की पीड़ा

से वेखबर,हमले के शिकार हिन्दूओं की सहायता के लिए विना कोई संगठित कदम उठाए घर की ओर लौट जाते हैं।

उधाहरण के लिए अगर आधे हिन्दू भी जाति ,भाषा व क्षेत्र के विभाजनों से उपर उठकर बोट करें तो एक सच्चे हिन्दू राजनीतिक

दल को दो तिहाई बहुमत मिलेगा।

आज धर्मनिर्पेक्षतावादी ,उग्र हिन्दूओं द्वारा मुसलमानों व अन्य अल्पसंख्यकों पर किए गए छुट-पुट हमलों की बात करते हैं।

लेकिन इन में से अधिकतर हमले कांग्रेस सरकारों द्वारा नियोजित रूप से करवाए गए, न कि संगठित हिन्दूओं द्वारा। जबकि

ISI व पाकिस्तान की सेना द्वारा प्रयोजित व नियोजित हमलों को छोड़ दें तो मुसलमानों द्वारा किए गए अधिकतर हमले गैर

राज्य उपद्रवियों द्वारा किए गए।

कट्टरपंथी मुसलमान हिन्दूओं को निरूत्साहित करने के लिए हिन्दूओं को निशाना बनाकर हमले करते हैं ताकि हिन्दू अपने उन

अधिकारों को छोड़ दें जो कि उन्हें नहीं छोड़ने चाहिए। इन हमलों का मूल उद्देशय भारतीय संस्कृति को कमजोर कर अन्त में

भारत को समाप्त करना है। ये 1000 वर्ष से लड़े जा रहे हिन्दूविरोधी-भारतविरोधी युद्ध का वो अधूरा उद्देश्य है जिसकी बात

ओसामाविन लादेन अक्कसर करता है।असल में मुसलिम आतंकवाद वही हथियार है जिसका उपयोग सुहरावर्दी और जिन्ना द्वारा

1946 में हिन्दूओं को पाकिस्तान बनाने की मांग मानने को मजबूर करने के लिए वंगाल में किया गया। कांग्रेस पार्टी ने हिन्दूओं

का प्रतिनिधि बनकर मुसलिम आतंकवाद के आगे घुटने टेकते हुए देश के भारत का 25% हिस्सा धर्मनिर्पेक्ष थाली में सजाकर

मुसलिम आतंकवादी जिन्ना के हबाले कर दिया। अब ये मुसलमान वाकी बचे 75% हिस्से पर आतंकवाद को हथियार बनाकर

कब्जा करना चाहते हैं।

हिन्दूविरोधी ताकतें

हम ये नहीं कहते कि इस्लाम को छोड़कर किसी और ने हिन्दूओं
को निसाना नहीं बनाया।आजादी के बाद के 6 दशकों में अंग्रेजो के
सम्राज्यबाद से प्रभावित इ वी रामास्वामी के नेतृत्व वाले,द्रविड़यन
अन्दोलन ने तर्कशीलता के नाम पर हिन्दू धर्म को तर्कहीन करार
देने की कोशिश की और हिन्दू धर्म का प्रचार करने वाले पुजारियों
को आतंकित कर हिन्दू धर्म का प्रचार करने से रोकने की कुचेष्ठा
की।

आंदोलन के संगठनात्मक हाथ, द्रविड़ कझगम (डी के) ने 50 वर्ष तक इसलिए राबण की पूजा की ताकि हिन्दूओं द्वारा भगवान राम की अराधना करने का उपहास उड़ाया जा सके व माता सीता के अपहरण को जायज ठहराकर हिन्दूओं को अपमानित किया जा सके। लेकिन जैसे ही द्रविड़ कझगम (DK) को ये पता चला कि रावण एक ब्राह्मण भगवान होने के साथ-साथ शिव का एक पवित्र भक्त भी था,तो इसने राबण की पूजा करनी बन्द कर दी।रामायण के अपमान की इस नीचता को छोड़ने के बाद DK ने अब उस भारत विरोधी LTTE का समर्थन करना शुरू कर दिया जिसने श्रीलंका में तमिल–हिन्दू नेताओं को मारने में विशेसज्ञता

हासिल कर ली है। वेशक अब LTTE के नाश के बाद DK अनाथ हो गई है।

गृह-युद्ध की स्थिति

1960 के दशक में ईसाई मिशनरियों ने नागा लोगों को भारत के विरूद्ध भड़काया। जिसके परिणामस्वारूप अब नागा भी भारत

से नागालैंड को अलग करवाकर भारत को और विभाजित करना चाहते हैं।

1980 के दशक में विदेश में प्रक्षिक्षण प्राप्त भारतविरोधी ईसाई आतंकवादियों ने मणिपुर में हिन्दूओं को निशाना बनाया। ईसाई

आतंकवादियों द्वारा मणिपुर में रहने वाले लोगों को धमकी दी गई कि या तो भारत का विरोध करो या फिर मरने के लिए

तैयार हो जाओ।

1986 से खासकर 1990 के दशक में कशमीर में इस्लामिक आतंकवादियों ने हिन्दूओं को निशाना बनाकर उनकी मां-बहन-वेटियों

को अपनानित करने के साथ-साथ हिन्दूओं का बड़े पैमाने पर कत्लयाम कर उन्हें कशमीर घाटी छोड़ने को मजबूर किया।

अब बड़े स्तर पर इस बात को माना जाने लगा है कि मुसलिम आतंकवादी हिन्दूओं को निशाना बनाकर हमले कर रहे हैं व

भारत के मुसलमान इन हमलों को मौन स्वीकृति दे रहे हैं। मुसलिम आतंकवादियों के विदेशी संरक्षक अब आतंकवादी हमलों को

कुछ इस तरह का अन्जाम दे रहे हैं ताकि मुसलमानों को हिन्दूओं के विरूद्ध राष्ट्रीय स्तर पर लड़ाया जा सके जिससे भारत में

सर्विया और वोसनिया की तरह गृह युद्ध छेड़ा जा सके ।

मुसलमानों को ‘उदारवादियों’ और ‘चरमपंथियों में विभाजित नहीं किया जा सकता है क्योंकि जब भी चरमपंथी मुसलमानों के

विरूद्ध कदम उठाए जाते हैं तब तथाकथित उदारवादी उनकी ढ़ाल बनकर खड़े हो जाते हैं। पाकिस्तान की असैन्य सरकार ने

पतंगवाजी पर सिर्फ इसलिए प्रतिबन्ध लगा दिया क्योंकि तालिवान पतंगवाजी को हिन्दूओं का खेल मानते हैं। मलेशिया और

कजाकिस्तान की उदारबादी सरकारें हिन्दू-मन्दिरों को गिरा रहीं हैं।

*सामूहिक प्रतिक्रिया *

इसलिए भारत में आतंकवाद से निपटने के लिए, भारतविरोधी इस्लामिक आतंकवाद के हाल के इतिहास से हमें सबसे पहला

सबक ये सीखने की जरूरत है कि आतंकवाद के निशाने पर हिंदू हैं और भारत के मुसलमानों को धीमी प्रतिक्रियाशील प्रक्रिया

के द्वारा आतंकवादी बनने के लिए क्रमादेशित किया जा रहा है ताकि वो हिन्दूओं के विरूद्ध आत्मघाती हमले करने पर अमादा

हो जायें। हिंदू मानस को कमजोर करने और गृहयुद्ध का डर पैदा करने के लिए इन आतंकवादी हमलों को अन्जाम दिया जा रहा

है।

और इसलिए क्योंकि आतंकवादियों के निशाने पर हिन्दू हैं, हिन्दूओं को हिन्दूओं के रूप में ही भारतविरोधी आतंकवादियों के

विरूद्ध संगठित होकर जबाबी कार्यवाही करनी चाहिए ताकि कोई हिन्दू खुद को अलग थलग या लालचार महसूस न करे। हिन्दू

को इसलिए आतंकवाद से मुंह नहीं फेर लेना चाहिए कि अभी तक उसके परिवार का कोई सदस्य इस आतंकवाद का सिकार नहीं

हुआ है।

आज अगर एक हिन्दू सिर्फ इसलिए मारा जाता है क्योंकि वह हिन्दू ता तो यह सब हिन्दूओं की नैतिक मौत है। ये विराट हिन्दू

का एक जरूरी और आबश्यक मानसिक रवैया है।( विराट हिन्दू की अबधारणा की अधिक जानकारी के लिए मेरी ‘Hindus Under

Siege: The Way Out Haranand, 2006).’ देखें।

इसलिए हमें मुसलिम आतंकवाद का सामना करने के लिए हिन्दू के नाते सामूहिक मानसिकता की जरूरत है। इस जबाबी

कार्यवाही में भारत के मुसलमान भी हमारे साथ आ सकते हैं अगर वो सच में हिन्दूओं के कत्लयाम के विरूद्ध हैं तो। मैं नहीं

मानता कि भारतीय मुसलमान हिन्दूओं पर हो रहे अत्याचारों के विरूद्ध तब तक हमारे साथ आयेंगे जब तक वो इस सच्चाई को

स्वीकार नहीं करते कि वेशक वो आज मुसलिम हैं लेकिन उनके पूर्वज भी हिन्दू ही हैं।

अपने पूर्वजों के वारे में इस सच्चाई को स्वीकार करना मुसलमानों के लिए आसान नहीं है क्योंकि मुसलिम मुल्हा इसका इसलिए

विरोध करेंगे क्योंकि इस सच्चाई को स्वीकारने के बाद एक तो भारतीय मुसलमानों में इस्लाम से मिली आत्मघाती कट्टरता

कमजोर हो जाएगी और दूसरा इस सच्चाई को जानने व स्वीकारने के बाद उनकी हिन्दू धर्म में घर बापसी की सम्भावनायें बढ़

जायेंगी। कहीं भारतीय मुसलमान इस सच्चाई को स्वीकार न कर लें इसीलिए मुसलमानों के धार्मिक नेता हर हाल में काफिर

बोले तो हिन्दूओं के विरूद्ध हिंसा और नफरत का प्रचार प्रसार करते रहते हैं।(उधाहरण के लिए आप कुरान के अध्याय 8 की

आयत 12 पढ़ सकते हैं।) इस्लामिक आतंकवादी संस्था सिमी(SIMI) पहले ही यह घोषणा कर चुकी है कि भारत दारूल हरब है

और SIMI इसे दारूल इस्लाम बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। भारत का दारूल हरब होना, मुसलमानों को हिन्दूओं का कत्लयाम

करने ,हिन्दूओं के मान सम्मान को ठेस पहुंचाने ,हिन्दूओं की मां-बहन-बेटियों की इज्जत आबरू के साथ खिलबाड़ करने के साथ

साथ उन्हें हिन्दूओं के प्रति हर तरह के नैतिक बन्धनों से मुक्त करता है क्योंकि मुसलमानों को कुरान व हदीस में दारूल हरब

को दारूल इस्लाम बनाने के लिए ये सब करने का आदेश दिया गया है।

बृहद हिन्दू समाज

परन्तु फिर भी अगर कोई मुसलमान इस बात को स्वीकार करता है कि उसके पूर्बज हिन्दू हैं तो हम उसे बृहद हिन्दू समाज बोले

तो हिन्दूस्तान के अंग के रूप में स्वीकार कर सकते हैं।भारत अर्थात इंडिया अर्थात हिन्दुस्तान हिन्दूओं और अन्य जिनके पूर्बज

हिन्दू हैं उन सबका देश है। यहां तक कि भारत में रहने वाले पारसियों और यहूदियों के पूर्बज भी हिन्दू ही थे। अन्य जो भारत

से अपना खून का रिस्ता होने की बात को अस्वीकार करते हैं या फिर जिनका भारत से खून का रिस्ता है ही नहीं या फिर वो

दिदेशी जो मात्र पंजीकरण की बजह से भारतीय नागरिक बने हैं वो भारत में रह तो सकते हैं लेकिन उन्हें बोट डालने का

अधिकार नहीं दिया जा सकता (मतलब वो चुने हुए प्रतिनिधि नहीं हो सकते)।

इसलिए आतंकबाद का मुकाबला करने बालीनीतिपर अमल करने से पहले हर और प्रतेक हिन्दू का प्रतिबद्ध और बिराट हिन्दू

बनना जरूरी है। किसी भी व्यक्ति को बिराट हिन्दू बनने के लिए एक हिन्दू मानसिकता रखना मतलब उसकी एक ऐसी

मानसिकता होना जरूरी है जो व्यक्तिगत और राष्ट्रीय चरित्र के अन्तर को समझ सके।

बिराट हिन्दू होने के लिए किसी हिन्दू का पबित्र, इमानदार और पढ़ा-लिखा होना ही काफी नहीं है।ये सब व्यक्तिगत चरित्र के

अंग हैं। राष्ट्रीय चरित्र वो मानसिकता है जो सक्रिय व पूरी ताकत से देश की पबित्रता और अखण्डता के लिए प्रतिबद्ध रहती है।

उधाहरण के लिए मनमोहन सिंह(प्रधानमन्त्री) का व्यक्तिगत चरित्र तो ठीक दिखता है परन्तु अर्द्ध साक्षर सोनिया गांधी की एक

रबर स्टैंप की तरह काम करते हुए हर राष्ट्रीय मुद्दे पर घुटने टेक देने की वजह से ये साबित हो चुका है कि उसका कोई राष्ट्रीय

चरित्र नहीं है।

भारत में आतंकवाद से निपटने के लिए, भारतविरोधी इस्लामिक आतंकवाद के हाल के इतिहास से हमें दूसरा सबक ये

सीखना चाहिए कि क्योंकि आतंकवादियों का उदेश्य हिन्दूओं का मनोबल तोड़ना और हिन्दू संस्कृति को समाप्त करने के लिए

भारत के हिन्दू आधार को तबाह करना है इसलिए हमें आतंकवादियों के आगे न तो हथियार डालने चाहिए और न ही

आतंकवादियों की किसी भी मांग को मानना चाहिए। आतंकवाद से लड़ने की किसी भी नीति का मूल आधार यही होना चाहिए

कि हम आतंकवादियों की किसी भी मांग को किसी भी हालात में नहीं मानेंगे।हमारे हाल के इतिहास में इसनीतिपर विलकुल भी

अमल नहीं किया गया। जबसे हमने 1947 में मुसलिम आतंकवादियों के दबाब में पाकिस्तान बनाने की मांग को स्वीकार किया

है तब से हम दबाब में बार-बार आतंकवादियों के आगे घुकने टेक देते हैं।

आतंकवादियों के सामने घुटने टेकने की घटनायें।

1989 में मुफ्ती मुहम्द सैयद की वेटी रूविया को आतंकवादियों से मुक्त करवाने के लिए वी पी सिंह सरकार द्वारा भारतीय

जेलों से पांच आतंकवादियों को छोड़ दिया गया।

इस घटना ने अपराधियों को कशमीरी अलगाववादियों व उनके समर्थकों की आँखों में नायक बना दिया ।क्योंकि इन अपराधियों

ने हिन्दूओं की सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर देने में सफलता हासिल की थी।रूविया को छुड़ाने के लिए आतंकवादियों के

आगे घुटने टेकना जरूरी नहीं था।

भारत के आधुनिक इतिहास में आतंकवादियों के आगे घुटने टेकने की सबसे शर्मनाक घटना तब घटी जब 1999 में आतंकवादियों

ने भारतीय विमान सेवा की उड़ान IC-814 को अगवा कर कन्धार पहुंचा दिया। सरकार ने न्यायालय से आज्ञा लिए विना ही

तीन आतंकवादियों को छोड़ दिया। मानो देश को शर्मशार करने के लिए इतना ही काफी न हो आतंकवादियों को पाकिस्तान में

धकेलने के बजाए, उनके साथ एक बिशेष अतिथी जैसा बर्ताव करते हुए प्रधानमन्त्री के विमान में विठाकर एक बरिष्ठ मन्त्री

द्वारा कन्धार पहुंचाया गया।

ये तीनों आतंकवादी कन्धार में छोड़े जाने के बाद वापिस पाकिस्तान गए। पाकिस्तान जाकर इन तीनों आतंकवादियों ने हिन्दूओं

को कत्ल करने के लिए तीन अलग-अलग आतंकवादी संगठन बनाए।मुहम्दहजर जिसे ततकालीन सुरक्षा सलाहकार ब्रजेस मिश्र ने

मेमना बताया था ने छोड़े जाने के बाद लश्करे तैयावा की कमान सम्भाली ।लश्करे तैयवा वह गिरोह है जिसने श्रीनगर से लेकर

बंगलौर तक हिन्दूओं को लहुलुहान करने के लिए बार-बार हमलों को अन्जाम दिया। अजहर ने मध्य 2000 से लेकर अब तक

2000 से अधिक हिन्दूओं का खून बहाया।यही अजहर दिसम्बर 13, 2001 में संसदभवन पर हुए हमले के लिए भी जिम्मेदार है।

तीसरा आतंकवादी जरगर अल-मुझाहिदीन-जंगान की स्थापना करने के बाद आजकल डोडा और जम्मू में हिन्दूओं का खून बहा

रहा है।

कन्धरा में की गई ये मुर्खता हमें के सबक देती है कि हमें कभी भी, किसी भी हालात में आतंकवादियों के आगे घुटने नहीं टेकने

चाहिए। अगर आप आतंकवादियों के आगे घुटने टेकते हैं तो आप घुटने टेक कर बचाए गए हिन्दूओं से कहीं ज्यादा हिन्दूओं का

कत्ल करवायेंगे। इसलिए आतंकवादियों से किसी भी तरह की सौदेबाजी पर लगाम लगाकर ,आतंकवादियों के सर्वनाश के लिए

आगे बढ़ना चाहिए।

सच का सामना

भारत में आतंकवाद से निपटने के लिए, भारतविरोधी इस्लामिक आतंकवाद के हाल के इतिहास से हमें तीसरा सबक ये

सीखना चाहिए कि आतंकवादी घटना कितनी भी छोटी या कम महत्व क्यों न हो देश को जबाबी कार्यवाही हर हाल में करनी

चाहिए—आतंकवादी घटना के बराबर या फिर विनम्र कार्यवाही नहीं वल्कि आतंकवादियों और उनके समर्थकों को सबक सिखाने

के लिए पूर्ण कार्यवाही।

उधाहरण के लिए अय़ोध्या पर किया गया आतंकवादी हमला वेशक बड़ा हमला नहीं था लेकिन हमें आतंकवादियों के हमले पर

जबाबी कार्यवाही करते हुए अयोध्य में एक भव्य राम मन्दिर का पुनरनिर्माण करना चाहिए था।

ये कलियुग है इसलिए हिन्दू विरोधी आतंकवादियों व उनके समर्थकों के प्रति किसी भी सातविक प्रतिक्रिया के लिए कोई जगह

नहीं है। हिन्दू धर्म में आपाकलीन धर्म का प्रावधान है जिसपर हमें आज के हालात में अमल करना चाहिए। ये हमारे लिए

सच्चाई का सामना करने का वक्त है। एक सभ्यता के रूप में अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए या तो हमें हिन्दू के रूप में

संगठित होकर हिंसक व अत्याचारी इस्लामिक आतंकवादी हमले का मुकावला करना चाहिए या फिर परसियन,वेवीलोनियन और

मिश्र की सभ्यता की तरह नष्ट होने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। ये सभ्यतायें अत्याचारी इस्लामिक आतंकवादी हमले का

संगठित होकर मुकावला करने में असमर्थ रहीं इसलिए इनका सर्वनाश हो गया। हमें शाम, दाम, दण्ड, भेद नियम का पालन

करते हुए हर हाल में अत्याचारी इस्लामिक आतंकवाद का सर्वनाश सुनिश्चित करना चाहिए वरना ये राक्षश हमें समाप्त करने में

कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।

गरीबी आतंकवाद का कोई कारक नहीं

भारत में इस्लामिक आतंकवादियों को प्रेरणा कहां से मिलती है? बहुत से लोग हिन्दूओं को ये सलाह देते हैं कि मुसलिम

आतंकवादियों पर जबाबी हमले करने के बजाए आतंकवाद के मूल कारण को खत्म करें। ये लोग मूल कारण भी बताते हैं।

निर्दोष हिन्दूओं का खून बहाने वाले आतंकवादियों के लिए हर तरह की सहानुभूति रखने वाले खूनी उदारवादी हमे बताते हैं कि

आतंकवाद के पनपने व बढ़ने का कारण अनपढ़ता, गरीबी, शोषण और भेदभाव है। ये तथाकथित उदारबादी कुतर्क देते हैं कि इन

आतंकवादियों का खात्मा करने पर जोर देने के बजाए आतंकवाद के इन चार कारणों को खत्म किया जाए। इन चार कारणों के

समाप्त होते ही आतंकवाद खत्म हो जाएगा। इन प्रशनों का उतर देने से पहले ये समझ लेना बहुत जरूरी है कि मुझें नहीं

लगता ये कातिल उदारवादी या खूनी बुद्धिजीवी भारत के प्रति बफादार हैं। ये हर व्यक्ति की भावनात्मक ताकत को खत्म कर

उसे जिन्दा मुर्दा बना देना चाहते हैं। मतलब मजबूरी को ये हिन्दूओं की मानसिकता का अंग बना देना चाहते हैं। इस तरह की

हीन भावना के साथ कोई भी देश य़ा समाज लम्बे समय तक जीवित नहीं रह सकता।

ये कहना बकवास है कि जो आतंकवादी आज तक हमले कर लाखों हिन्दूओं का खून बहा चुके हैं वो गरीब हैं।उधाहरण के लिए

दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी ओसामा विन लादेन अरबपति है।खनिज तेल से वेहिसाब पैसा कमाने वाले अमीर देश मुसलिम

आतंकवादियों को संरक्षण और आर्थिक मदद पहुंचाते हैं। ब्रिटेन में आतंकवादी हमलों को अन्जाम देने के दोषी सबके सब

आतंकवादी साधन सम्पन मुसलमान हैं।

मुसलिम आतंकवादी अनपढ़ भी नहीं हैं। आतंकवादियों के अधिकतर सरगना डाकटर,चार्टड एकौंटैंट(CA),एम बी ए(MBA) और

अध्यापक हैं। उधाहरण के लिए दिल्ली में धनतेरस के दिन सैंकड़ों हिन्दूओं का कतल करने वाला आतंकवादी रसायन विज्ञान में

सनातकोतर है व टायम सुकेयर पर हमले का असफल प्रयास करने वाला आतंकवादी सहजाद MBA है वो भी अमेरिका के एक

उच्चस्तरीय विश्वविद्यालय से।

उसका सबन्ध पाकिस्तान के एक अमीर परिबार से है। निश्चित तौर पर उसने अपने ही देश पाकिस्तान में किसी भी तरह का

भेदभाव नहीं सहा।11 सित्मबर,2001 को जिन 9 लोगों के गिरोह ने चार हबाई जहाजों को अगवा कर World Trade Towers

सहित अन्य जगहों को निशाना बनाया निश्चित तौर पर उनके साथ भी अमेरिका में किसी तरह का भेदभाव या शोषण नहीं हुआ

था। इसलिए ये कहना कि आतंकवाद गरीब आतंकवादियों की देन है पूरी से मूर्खतापूर्ण है।

अगर हम बांमपंथी उदारवादी कुतर्क को मान भी लें तो क्या बामपंथी इस बात से सहमत हैं कि मुसलिम देशों में प्रताड़ित सबके

सब गैर मुसलमानों को आतंकवादी बनकर मुसलमानों का कत्ल करना चाहिए। कशमीर घाटी जहां पर मुसलमान बहुमत में हैं

वहां पर घारा 370 लगाकर बहुसंख्यक मुसलमानों को विशेषाधिकार दिए गए हैं व अल्पसंखयक हिन्दूओं का कत्लयाम किया

गया ,हिन्दूओं की मां-बहन वेटियों के साथ बालातकार किए गए, अन्त में उन्हें वहां से जगा दिया गया।वो अपने ही देश में वेघर

होकर दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं तो क्या ये उदारबादी उनके द्वारा मुसलमानों के विरूद्ध हथियार उठाने पर उनका बैसा

ही साथ देंगे जैसा वो आज तक हिन्दूओं का कत्ल करने वाले मुसलिम आतंकवादियों का देते आए हैं?

यह कहना कि क्योंकि आतंकवादी मरने-मारने को तैयार हैं,वे अपना विवेक खो चुके हैं,उनका कोई घरबार नहीं है इसलिए उनका

कत्ल नहीं किया जाना चाहिए। आतंकवादियों के सरगनाओं की इस आतंकवाद रूपी पागलपन में भी एक सोची समझी रणनीति

और योजना है जिसके लिए उन्होंने निश्चित राजनीतिक उद्देश्य चुने हैं। इसलिए हमें आतंकवादियों को कुचलने के साथ-साथ एक

ऐसी रणनीति पर अमल करना है जो आतंकवादियों के उद्देश्यों को पूरी तरह से विफल कर दे। ऐसी रणनीति कैसे बनाई जा

सकती है। राबर्ट टरैगर और देशीसलाबा(Robert Trager and Dessislava Zagorcheva) ने शोध पत्र आतंकवाद का

मुकाबला((‘Deterring Terrorism’ International Security, vol 30, No 3, Winter 2005/06, pp 87-123) में आतंकवाद का

मुकाबला करने के लिए रणनीति बनाने के लिए समान्य सिद्धांत बताए हैं।

सामरिक योजना

अगर मुसलिम समाज आतंकवादियों के इन उद्देश्यों को गैरइस्लामिक घोषित कर इनकी निंदा और विरोध नहीं करता है तो इन

सिद्धांतों का उपयोग कर मैं इस्लामिक आतंकवादियों के राजनैतिक उदेश्यों को असफल करने के लिए निम्नलिखित

सामरिकनीतिका समर्थन करता हूं।

षडयन्त्र-1 :-कशमीर पर भारत को आतंकित करना।

रणनीति-1:- धारा 370 समाप्त कर,भूतपूर्व सैनिकों को कशमीर घाटी में बसाना। कशमीरी हिन्दूओं के लिए पुनन कशमीर का

निर्माण करना,बलूचियों और सिंधियों को आजादी के लिए सहायता देना।

षडयन्त्र-2:- हमारे मन्दिरों में बम धमाके कर भक्तों का कत्ल करना।

रणनिति-2:- जैसे को तैसानीति अपनाते हुए काशी विश्वानाथ मन्दिर परिसर सहित 300 अन्य जगहों से मसजिदों को

हटाना।

षडयन्त्र :-3 भारत को दारूल इस्लाम बनाना ।

रणनिति-3:- भारत में एक समान नागरिक संहिता लागू करना,पढ़ाई के लिए संस्कृत को अनिवार्या बनाना,वन्देमातरम् का

गान जरूरी करना और भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित कर सिर्फ उन्हीं गैर हिन्दूओं को बोट का अधिकार देना जो गर्व से ये

स्वीकार करें कि उनके पूर्बज हिन्दू हैं। भारत का हिन्दूस्तान(हिन्दूओं और उन गैर हिन्दूओं का देश जिनके पूर्बज हिन्दू हैं) के रूप

में पुन : नामकरण करना।

षडयन्त्र-4 अवैध आप्रवास, धर्मांतरण, और परिवार नियोजन को अपनाने से इनकार द्वारा भारत

की जनसांख्यिकी बदलें.

रणनिति-4:- देश में एक ऐसा राष्ट्रीय नियम लागू करें जिसके अनुसार हिन्दू धर्म से किसी भी अन्य धर्म में धर्मांतरण करना

बर्जित हो। किसी भी अन्य धर्म से हिन्दू धर्म में घर वापसी इसमें प्रतिबन्धित नहीं होनी चाहिए। गैर हिन्दूओं द्वारा अपनी

इच्छा के अनुसार किसी भी जाति में घर वापसी करने का स्वागत करें बशर्ते वे अनशासन का पालन करने को तैयार हों। भारत

में रहने वाले अबैध वंगलादेशियों की शंख्या के अनुशार बंगलादेश की जमीन पर कब्जा कर लिया जाए। आज की संख्या के

अनुसार सिलहट से खुलना तक के उतर का एक-तिहाई भारत को अबैध रूप से भारत में रह रहे बंगलादेशियों को बसाने के लिए

अपने कब्जे में ले लेना चाहिए।

षडयन्त्र-5 हिन्दूओं के अन्दर आत्मगलानी का बोध पैदा करने व उन्हें आत्म समर्पण के लिए

मजबूर करने के मकसद से मस्जिदों, मदरसों और चर्चों में अश्लील लेखन और उपदेश के

माध्यम से हिंदू धर्म को बदनाम करना।

रणनिति-5:- हिन्दू मानसिकता के विकाश का प्रचार-प्रसार करें( मेरी नई पुस्तक ‘हिंदुत्व और राष्ट्रीय पुनर्जागरण’ Haranand,

2010 देखें।)

समाधान का समय

भारत इस तरह की रणनीति अपनाकर सिर्फ पांच बर्षो में अपनी आतंकवाद की समस्या का समाधान निकाल सकता है परन्तु

इसके लिए हमें आतंकवाद द्वारा सिखाए गए उपरलिखित चार सबक हर समय याद रखने होंगे और राष्ट्र की रक्षा के लिए

साहसिक,जोखिम भरे व कठोर कदम उठाने के लिए हिन्दू मानसिकता का निर्माण करना होगा।यदि यहूदियों को गैस चैंबरों में

जलाए जाने के लिए मिमयाते हुए जाने वाले मेमनों से ज्वलंत शेर में सिर्फ 10 वर्ष में बदला जा सकता है तो हिन्दूओं के लिए

तो उनसे कहीं वेहतर हालात (आज भी हम भारत का 83 प्रतिशत हैं) में ये काम सिर्फ पांच वर्ष में करना किसी भी तरह से

मुशकिल नहीं है।

परम्पूजनीय गुरूगोविन्द सिंह जी द्वारा हमें पहले ही रास्ता दिखा दिया गया है कि किस तरह सिर्फ पांच निडर लोग

आध्यात्मिक मार्गदर्शन में सारे समाज को बदल सकते हैं।यहां तक कि अगर आधे हिन्दू मतदाता भी संगठित होकर हिन्दू के

रूप में, इमानदारी से हिंदू एजेंडा के लिए प्रतिबद्ध पार्टी को,बोट डालने के लिए प्रोतसाहित किए जा सकें तब भी हम परिवर्तन के

लिए एक मजबूत आधार तैयार कर सकते हैं। और अंततः सच्चाई के इस क्षण में एक लोकतांत्रिक हिंदुस्तान में यही आतंकवाद

से लड़ने की रणनीति में निम्नतम जरूरत है/

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“डेरा इस्माइल खान नगर में एक शैख़युसूफ की खानकाह है | जिससे सैकड़ों हिन्दू स्त्री-पुरुष मुरादें मांगने जाते हैं | वहाँ के मुजावर (पुजारी) प्रथम मुख पर थूकते हैं, पुनः जूते लगाते हैं | एक बार डेरा में कुछ हिन्दू मुझसे पूछने लगे कि वह थूकते तो हैं परन्तु जूते क्यों लगाते हैं | मैंने कहा कि थूकते इसलिए हैं कि तुम परमात्मा पारब्रह्म को छोड़ कर कबर पर सिर रगड़ने आए | क्यों कि थूक शीघ्र सुख जाती है अतः जूते भी लगाते हैं जिससे तुम शीघ्र से भूल न जाओ |
अल्ह्जर ऐ कौमे नादां अल्हजर |
अर्थात् ईश्वर से डर ऐ मुर्ख जाति !! ईश्वर से डर |”
ऊपर का प्रसंग पण्डित लेखराम जी पुस्तक कुलियात आर्य मुसाफिर में पृष्ठ २०९ में मिलता हैं |
लगभग ७० वर्ष पुराना यह प्रसंग है पर स्थिति वही कि वही है हमारे हिन्दू भाइयों कि | आज भी पिट रहे हैं मुसलामानों से, माथा पटकते हैं तो कबर के ऊपर | चढावा चढाते हैं तो दरगाह पर, मस्जिद, कबर के ऊपर फिर रोते हैं लव-जिहाद, आतंकवाद, हज-सब्सिडी आदि आदि पर |
  • ·   ये हिन्दू मुर्ख कभी अजमेर जायेंगे तो ख्वाजा नवाज की दरगाह जरुर जायेंगे – कभी भूल कर भी ऋषि उद्यान जा कर महर्षि दयानन्द को विनयांजलि नहीं देते, विचार-प्रेरणा नहीं लेते |
  • ·     ये हिन्दू मुर्ख कभी दिल्ली जाते हैं तो “हजरत मटके शाह बाबा कलंदर रहमतुल्लाह पीर” के ऊपर मटका चढाते हैं पर कभी गुरुद्वारा शीशगंज नहीं जाते, भोग नहीं लगाते, शबद नहीं सुनते, लंगर नहीं खाते | जिस गुरु ने हमारे धर्म को बचाने के लिए अपने शीश कटाया था उसे कभी याद नहीं करते |
  • दिल्ली जा कर हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह जरुर जायेंगे पर कभी भाई मतिदास को याद नहीं करते |

·     ये हिन्दू मुर्ख कभी बम्बई जाते हैं तो संत तुकाराम जी के मंदिर नहीं जाते पर मुल्ला साईं बाबा के दर्शन करेंगे | संत तुकाराम जी का स्थान देहु मुम्बई के पास है और शिरडी दूर फिर भी साईं को पूजेंगे | पूजेंगे भी और पिटेंगे भी | इस साईं बाबा ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया था जबकि साईं-बाबा के समकालीन रानी लक्ष्मी बाई जी ने अपना जीवन-राज-पाट सब अर्पण कर दिया था |

·     ये हिन्दू मुर्ख कभी झाँसी जायेंगे तो जाकर जीवन शाह की मजार जायेंगे पर रानी लक्ष्मी बाई को याद नहीं करेंगे |
प्रभु !! इस हिन्दू जाति को बुद्धि दो, स्वाभिमान दो, प्रेरणा दो, वेद-पथ पर चले और राम-कृष्ण-शंकर-हनुमान-व्यास-वशिष्ठ के अनुगामी बनें |

 

मुस्लिम-मत ने, हिंदू-मत को क्या दिया ????

प्रथम स्पष्ट कर दूँ कि ऊपर के शीर्षक में मैंने “मुस्लिम-धर्म” या “हिंदू-धर्म” शब्द का प्रयोग नहीं किया है परन्तु “मत” शब्द का प्रयोग किया है क्यों कि संसार में धर्म तो एक ही है – वैदिक धर्म, और बाकी सारे तो मत, पंथ, मार्ग, विचार, परिवार, समुदाय या दल हैं | इसलिए हिंदू धर्म को धर्म नहीं पर “मत” कहा जाना चाहिए, वैसे भी हिंदू मत वाले “मतवाले” ही होते हैं | इस वैदिक धर्म को ही आप मानव-धर्म कह सकते है और इसी धर्म को आप सत्य-सनातन धर्म भी कह सकते हैं| ५११२ वर्ष पहलें कोई समय था जब सारी धरती पर एक ही धर्म था – वैदिक धर्म | ना ईसाई, ना मुस्लिम,ना जैन, ना बौद्ध,  ना सिक्ख या कोई और |

 

किसी भी दो अलग-अलग परिवेश में पले-बढ़े व्यक्ति या परिवार के मिलने पर कुछ नया सीखना-सिखाना, विचार-व्यवहार का होना स्वाभाविक है | एक परिवार कि पुत्री विवाहित होकर दूसरे परिवार कि सदस्य (बहु) बनती है तब ससुराल में अपने साथ कुछ नया संस्कार, विचार, व्यवहार लाती है और साथ ही ससुराल से कुछ सीखकर जब माँ के घर जाती है तब भी कुछ ससुराल के संस्कार, विचार मायके में बताती है और इस प्रकार एक सम्बन्ध के साथ-साथ अन्य बातों का भी आदान-प्रदान होता है | विवाह के बाद आदान-प्रदान होता है रहन-सहन, खान-पान आदि का ठीक उसी प्रकार दो मतों के बीच में भी द्वन्द चलता है और आदान-प्रदान भी चलता रहता है | मुस्लिम मत के दीर्घ शासन काल में हिंदू मत के ऊपर बहुत सारे अत्याचार किये गए और इस दौरान हिंदू मत ने क्या-क्या अपनाया, मुस्लिमों ने हमको क्या-क्या दिया, उसका एक संकलन नीचे प्रस्तुत किया है, कृपा कर विचार करें और अच्छी बातों के समूह (वैदिक धर्म) में प्रवेश कर चुकी बुराइयों (अन्य सारे मतों) को छोडें |

 

प्रस्तुत है मुस्लिम मत ने हिंदू मत को क्या-क्या दिया या हिंदू मत ने मुस्लिम मत से क्या-क्या लिया :-

  • हिंदू नाम :- सबसे पहले अपने आप को –“गर्व से कहो हम हिंदू है” कहने वाले हिंदू को “हिंदू” नाम मुस्लिमों ने दिया | कभी स्वामी विवेकानंद ने कहा होगा “गर्व से कहो हम हिंदू है” बस फिर क्या था सब के सब लग गए रटने “गर्व से कहो हम हिंदू है”…. “गर्व से कहो हम हिंदू है” | किसी ने फुर्सत से सोचा नहीं कि आखिर हम अपने आपको हिंदू क्यों कहें ??? विवेकानंद को हिंदू धर्म का आदर्श पुरुष बताया जाता है पर किसी के पास समय नहीं है विवेकानंद का साहित्य पढ़ने का और सच्चाई जानने का | विवेकानंद ने क्या सच में हिंदू धर्म के लिए काम किया था ?? या अन्य धर्म के समर्थन में भी काम किया था ?? इन सारी बातों पर हमें विचार करना चाहिए | (इस पर मैं कभी स्वतंत्र लेख लिखूंगा) पर ये हिंदू शब्द आया कहाँ से ? किस भाषा का शब्द है ये ? इसका क्या अर्थ है ? हम कब से हिंदू कहलाने लग गए ? क्या राम और कृष्ण हिंदू थे क्या ? यदि नहीं थे तो वे कौन थे ? क्या हमारे शास्त्रों में हिंदू शब्द का उल्लेख आता है क्या ? रामायण, रामचरितमानस, महाभारत, गीता, वेद, उपनिषद, दर्शन ….. अरे हनुमान चालीसा…. आदि किस पुस्तक में हिंदू नाम आता है ? यदि नहीं आता तो हम कितने वर्ष पूर्व हिंदू कहलाने लग गए ? इन सारे प्रश्नों का उत्तर खोजे बिना सब अपने आपको हिंदू कह और लिख रहे हैं | मैं मानता हूँ कि आज अपने-आपको हिंदू लिखना और कहना हमारी मजबूरी है | ये मजबूरी हमारी ही पैदा कि हुई है, अगर हमारे पूर्वजों ने अपना असली नाम “आर्य” कहना/लिखना छोड़ा न होता तो आज हम अपने आपको हिंदू क्यों कहते? अपने-आपको हिंदू लिखना और कहना हमारी मजबूरी है क्यों कि सरकारी दस्तावेजों में कहीं हिंदू के अलावा और कोई विकल्प नहीं है तो मजबूरन हमें हिंदू लिखना पड़ता है जैसे जनगणना के दस्तावेज में न चाहते हुए भी हिंदू लिखवाना मजबूरी है, हम चाह कर भी अपने आप को वैदिक धर्मी नहीं कह सकते, पर हिंदू कहने पर गर्व करना ? यह कैसी मजबूरी ? ये कैसी मूर्खता ? आइये ! ऊपर के प्रश्नों के उत्तर खोजे |

हिंदू शब्द हमें मुस्लिमों ने दिया और हमने बड़े प्रेम से उसे स्वीकार कर लिया | यह शब्द फारसी भाषा का है, जिसका अर्थ होता है – काला, काफ़िर, लुटेरा | क्या हम सब काले और/या लुटेरे हैं ?? काफ़िर का मतलब होता है जो मुसलमान नहीं है वह व्यक्ति | हिंदू कि परिभाषा क्या है ?? जो व्यक्ति मुसलमान या ईसाई नहीं है वे सब हिंदू हैं | ये कैसे परिभाषा है ? यह परिभाषा नकारात्मक है क्यों कि हिंदू कि एक सर्वमत सम्मत मान्यताएँ नहीं हैं | आप ईश्वर को निराकार या साकार मानते है तब भी आप हिंदू है, जड़ या चेतन कि पूजा करते है तब भी आप हिंदू है| हिंदुओं को अपना सर्व सम्मत धर्मग्रन्थ कोई नहीं है, कोई सुनिश्चित नहीं है, कोई कहेगा वेद, तो कोई गीता, कोई रामायण तो कोई पुराण भी, और किसी किसी को तो पता भी नहीं| जब कि ईसाई का एक ही ग्रन्थ है – बाईबल, मुसलमान का एक ग्रन्थ है कुर्-आन| और हमारा ? सब कुछ अनिश्चित |

 

हाल ही में हिंदू शब्द कि एक और व्याख्या कि गयी और बताया गया कि यह एक जीवन शैली का नाम है | जब से माननीय न्यायालय ने बताया तब से हिंदू कहने लगे कि ये एक जीवन शैली है पर मैं पूछता हूँ कि ये कौन सी जीवन शैली है ? किस जीवन शैली कि बात कर रहे हैं आप ? सबेरे ४ बजे उठने वाली या ८-९ बजे उठने वाली ? सूर्य ढलने से पहले खाना खा लेने वाली या १२ बजे तक चरते (खाते) रहने वाली ? भुत-प्रेत, बलिप्रथा आदि बुराइयों को मानने वाली?   पीपल के पेड़ पर धागा बांधने वाली ? जिन्दा-स्त्री को मृत-पति के साथ जला कर ठंडी हत्या कर देने वाली? और सती-प्रथा को शास्त्र-सम्मत बताने वाली ? देवी-देवता को शराब व मांस का भोग लगाने वाली? साधु-सन्यासी चिलम, अफीम, गांजा पीते है वह जीवन शैली ? मृत्यु के बाद शव को जलाना, गाडना, पानी में बहाना? कौन सी जीवन शैली? तो निष्कर्ष ये निकला कि ये परिभाषा गलत है |

 

फिर एक और परिभाषा दी जाती है कि “जो कश्मीर से केरल और गुजरात से असम तक रहते हैं वे सारे हिंदू | हिंदुस्तान में जो रहे वो हिंदू” | ये परिभाषा भी लचर और कमजोर है | यदि इस परिभाषा को मान लिया जाय तो फिर श्रीलंका, पाकिस्तान, बंगलादेश, अरब, अफ्रीका, अमेरिका आदि में रहने वालों का क्या होगा ? वे हिंदू नहीं रहेंगे | और हिंदुस्तान में तो मुस्लिम व ईसाई भी रह रहे है वे इस परिभाषा के अनुसार अपने आप को हिंदू तो कहेंगे नहीं तो फिर उनका क्या करेंगे ?

 

एक और व्याख्या की जाती है कि “हिनस्ति दुरितानि इति हिंदू” जो दुर्गुणों का नाश करें वह हिंदू | हिंदू शब्द के “हि” और “दू” दोनों कि व्याख्या कर दी पर व्याख्या करने वाला ये भूल गया कि ये हिंदू शब्द संस्कृत का नहीं है | जब शब्द संस्कृत का नहीं है तो फिर व्याख्या संस्कृत के नियमों के अनुसार कैसे होगी ?

 

तो मेरे प्यारे भैया ! ये हिंदू शब्द कि दी जाने वाली सारी की सारी व्याख्याएँ, परिभाषाएँ गलत है | एक गलत को सही साबित करने कि बिन-जरुरी कसरत है और कुछ नहीं | आवश्यकता है सच्चाई को स्वीकार करने की, कि हम हिंदू नहीं है |

 

गर्व करने योग्य एक ही नाम है “आर्य” | राम और कृष्ण हिंदू नहीं थे, वे आर्य थे | हमारे किसी भी शास्त्र में हिंदू शब्द का उल्लेख नहीं है पर आर्य शब्द का उल्लेख तो बौद्ध और जैन ग्रंथों में भी मिलता है | हम कुछ सौ वर्षों से हिंदू अपने-आपको कहते चले गए और सामने वाला हमें हिंदू कहता चला गया असलियत में वो तो हमारा अपमान कर रहा था, पर हम थे कि समझे ही नहीं |

 

अपने इस झूठे गर्व करने योग्य शब्द पर गर्व न करते हुए हिंदू नाम को छोड़ कर अपने सच्चे नाम “आर्य” पर आ जाओं | पर क्या करें हम ! रास्ता इतना लंबा काट लिया है कि अब शुरुआत करने के लिए बहुत शक्ति चाहिए | पर भैया ! कही से तो करनी ही होगी शुरुआत, तो क्यों ना आज से ही शुरुआत करें | आर्य का अर्थ होता है महान्, उत्तम पुरुष, श्रेष्ठ पुरुष | आइये ! मुस्लिमों द्वारा दिए गए इस भेंट में मिले नाम को छोड़ दें, त्याग दें | जहाँ जरुरत नहीं वहाँ उसका प्रयोग ना करें और कम से कम गर्व तो ना ही करें | मजबूरी में किसी जगह लिखना पड़े तो -लिखें, पर गर्व तो नहीं ही |

  • ताबीज :- आज लगभग हर हिंदू के गले में और/या भुजा में ताबीज सुशोभित है वह भी मुसलमानों की ही देन है | हमारे में से बहुत सारे भाई-बहन सबेरे या शाम या सप्ताह में कम से कम एक बार हनुमान चालीसा का पाठ किया करते हैं और कहते हैं “काँधे मूँज जनेऊ साजे” |  जिसका अर्थ होता है कि चार वेदों के विद्वान हनुमान जी अपने शरीर पर जनेऊ पहनते थे और उनका शरीर जनेऊ से सुशोभित लगता था | पर हनुमान चालीसा का पाठ करने वाला भक्त स्वयं जनेऊ नहीं पहनता | अगर वह पहनता है तो फिर मुस्लिमों का दिया हुआ ताबीज ही पहनता है | अपने गले में या बांह में लटकाए या बांधे ताबीज को क्या कभी आपने तोड़ कर या खोल कर देखा है ??? आखिर इसमें है क्या ?? यदि नहीं ! – तो अब कर के देखें | आप पाएंगे वो अक्षर या लकीरें जो समझ नहीं आने वाली | इन ताबीजों में अरबी भाषा में लिखा होता है | इस अरबी भाषा को पढ़ना और उसका अर्थ बताना आपके परिवार या आसपड़ोस के हर सदस्य के लिए कठिन काम हो जायेगा | यदि हम इसे पढ़ नहीं सकते या अर्थ नहीं जानते तो फिर बाँधने / पहनने से क्या लाभ ? क्यों पहने हम ? अरे ! बाँधना ही है तो आप गायत्री मंत्र लिख कर बाँध लें ! पन्डित रुचिराम जी ने अरब देश में सात साल रह कर अनेक मुस्लिमों के गलें में गायत्री मंत्र का ताबीज बना-बना कर पहनवाया था | क्या हम ऐसा नहीं कर सकते ? अगर हम गायत्री मंत्र का ताबीज मुसलमान को नहीं पहना सकते तो फिर अरबी में लिखी कुर्-आन की एक आयत से बना ताबीज अपने गले क्यों ???? और वो भी जनेऊ उतारने कि कीमत पर ???? कभी नहीं | ऐसा कभी नहीं होना चाहिए | दूसरा, यदि एक मंत्र को ही गले या बाँह में बाँधने से लाभ मिलता है तो फिर तो पूरी कि पूरी पुस्तक ही क्यों न बांध ली जाये ? जरा ठहरें ! और किसी काम को करने से पहले विचार करें |

 

हमारे कुछ हिंदू भाई भी नक़ल करने में बहुत माहिर हैं, ताबीज का हिंदू संस्करण भी निकाल लिया गया है | आपने सुना होगा “हनुमान सिद्ध मंत्र अभिषिक्त लॉकेट” आदि आदि | ये सब क्या है ? ये सब के सब ताबीज के ही तो रूपांतरण हैं | यदि हनुमान लॉकेट पहनने से हमारे दुःख दूर होंगे तो फिर हनुमान जी अपने दुःख दूर करने के लिए क्या पहनते थे ? क्या हनुमान जी भी कोई मन्त्र अभिषिक्त यन्त्र या लॉकेट पहना करते थे ? नहीं | हनुमान जी स्वयं चारों वेदों के पण्डित थे और सारे के सारे मंत्र उनको याद थे तो फिर वे कौन सा लॉकेट पहनते ?? आप भी एक मंत्र याद करें और फिर उसका अर्थ याद करें जब मन्त्र और उसका अर्थ याद हो जाय तब दूसरा मंत्र याद करना शुरू कर दें और यह क्रम सतत चलता रहना चाहिए  | जब सारे मंत्र याद करते-करते सिद्धि प्राप्त हो जायेगी तब मुक्ति अर्थात् सुख आनंद खुद ही मिल जायेगा | तो फिर आज से ही लग जाइये वेद मंत्र याद करने में, उतार कर छोड़ दें ताबीज को और धारण करें जनेऊ जो हनुमान चालीसा में कहे अनुसार आपकी कंचन काया (शरीर) पर शोभा देगा |

  • कबर :- मुस्लिम मत ने हमें दी “कबर” और “कबर पूजा” | हम नकलची हिंदू क्यों पीछे रहते तो हम भी लग गए कबर बनाने/बनवाने और पुजवाने | पर हम हिंदुओं ने इस कबर को सुन्दर सा नाम दिया “समाधि” | हर अनपढ़ साधु (घर का भगौड़ा) के मरने के बाद हमने उसे गाडना शुरू कर दिया और कहने लगे “समाधि” जब कि वेद में साफ़ लिखा है कि मरने के बाद शरीर को गाडना नहीं, जलाना चाहिए ताकि शरीर अपने मूल पाँच तत्वों में जल्दी से जल्दी मिल जाये पर “हिंदू” अपनी मान्यताओं को छोडकर अन्यों कि बातों / प्रथाओं को स्वीकार करने में ही अपनी धन्यता समझता है | “कबर” को “समाधि” बता बता कर जब ये कबरें सामान्य हो गयी तो तब भी हमने हार नहीं मानी और किसी बड़े साधु के मरने पर बनी कबर को “महासमाधि” तक कहने लगे जैसे पुट्टपर्थी के साईं बाबा को हाल ही में दी गयी समाधि(कबर) को समाधि न कह कर हम उसे महासमाधि कहते है जैसे तो बहुत बड़ी उपलब्धि न हो | आपको याद होगा कुछ वर्षों पूर्व जब दूरदर्शन पर महाभारत धारावाहिक आता था तब सारे विज्ञापनों में महाभारत कि नक़ल कर के अपने उत्पाद को “महा” बताते थे | तो अब अगला चलन होगा “महासमाधि” का, जब भी कोई प्रसिद्ध साधु मृत्यु को प्राप्त होगा तो उसकी कबर(समाधि)नहीं, पर महाकबर (महासमाधि) बनेगी | “महासमाधि” की तुलना हम मुस्लिम मत द्वारा बनाई जा रही “गाजी-कबर” से कर सकते है | गाजी कबर में शरीर के नाप के अनुसार नहीं, पर कबर, गज के अनुसार बनाई जाती है | जहाँ-जहाँ आप शरीर के नाप से लंबी कबर देखें तो समझ लें कि वह गाजी-कबर है | ये गाजी कबरें केवल जमीन घेरने के लिए ही बनाई जाती है और मूर्खों के सामने उसकी महिमा गा- गाकर लूटने के लिए ही बनाई जाती है | कृपा कर कबर (समाधि) बनने से बचें | आज तक आपने आदि शंकराचार्य की, पाणिनि, संदीपनी, शंकर, हनुमान, राम, कृष्ण, अम्बा, गुरु नानक जी, आदि देवी-देवताओं या किसी विद्वान कि कबर नहीं सुनी होगी और नहीं देखी होगी क्यों कि ये सारे देवी-देवता, विद्वान वेद के अनुसार अपने शरीर को अग्नि को सौप देते थे न कि जमीन को | ये ऊपर गिनाये सारे विद्वान, देवी-देवता किसी न किसी महान् कार्य के लिए या उनके द्वारा लिखी गयी पुस्तक के लिए याद किये जाते है पर आज के अनपढ़ साधुओं ने तो कुछ भी ऐसा नहीं किया जिसके कारण वे याद किये जाय इसलिए अपना स्मारक कबर बनवा कर लोगों से पुजवाते हैं | पाणिनि अपनी अष्टाध्यायी के कारण याद किये जाते है पर आज के साधु ?? कबर के कारण | कृपा कर कबर बनाने/बनवाने से बचे और अन्यों को भी प्रेरित करें कि जमीन में नहीं, शरीर को मरने के बाद जला देना ही उत्तम है |
  • कबर पूजा :- कबर पूजा भी हमने मुस्लिमों से सीखी है | आप सब अपने आस-पड़ोस, नगर में देखते होंगे कि बहुत से हिंदू भाई, कबरों को पूजने जाते है | क्या कभी आपने सोचा या पूछा, कौन थे ये लोग जो कबरों में दबाएँ गए हैं ? नहीं ? तो आज ही पूछें | पहले जानें और फिर कोई कार्य करें | ये जितनी भी कबरें बनी है उन सारी कबरों में किसी ना किसी ऐसे मुस्लिम को दबाया गया है जो विद्वान नहीं मुर्ख थे | हमारी संस्कृति में विद्वानों को आदर दिया जाता है न कि मूर्खों को | ये कबरों में दफनाए गए लोग दिन में तो निकम्मे बैठे-बैठे रहते थे और हमारी-आपकी माँ,बहन,बेटी को ताकते रहते थे या किसी मुस्लिम सुल्तान, आक्रमणकारों का जासूस हवा करता था | जो जितना ज्यादा दुराचारी, अनपढ़, ठग होता था या जिसने जासूसी करके ज्यादा से ज्यादा लाभ सुल्तान या आक्रमणकारों को दिलवाया होता था उसकी कबर उतनी ही बड़ी, सुन्दर, सजी-धजी बनाई जाती थी | कमाल कि बात तो ये है कि ये कबरें बनाई भी जाती थी तो हमारे ही मंदिरों में, गुरुकुलों में और फिर कहते थे कि ये अमुक भवन हमने बनवाया …. इसलिए भाइयों आप खुद बचे और दूसरों को बचाएं | कबर पूजा कोई अच्छा काम नहीं है | भारत में जब गजनवी आया था तब सोमनाथ के ऊपर १७ बार हमला किया था, हर बार वह हारा, इसने बलवान्  थे हम, पर जब मुस्लिमों ने पाया कि ऐसे हम हारने वाले नहीं है तो कुछ जासूस भेजे गए | इन जासूसों ने अपने आपको सूफी संत बताया | हम भोले भले लोग थे, साधुओं को मान-सम्मान देना हमारे स्वाभाव में था तो लग गए इनके पीछे जैसे तो हमारे विद्वान, तपस्वी संतो से ये सूफी ज्यादा विद्वान् व सदाचारी न हों | हमारे पास अपने विद्वान, सदाचारी, तपस्वी, योगी सन्यासियों कि कोई कमी नहीं थी और न आज है पर हम लगे रहते है ऐसे धूर्तों के पीछे | जासूस को तो बनी-बनाई, पकी-पकाई बातें, रिपोर्ट मिल गयी और भेज दी अपने सुलतान तक, जनता भी सूफी संत पर लट्टू और बातें भी पता चल गयी तो सुलतान आ कर धमक गया राजा पर, सारे के सारे सैनिक मारे गए, माँ-बहन-बेटियों कि इज्जत लूट-लूट कर विधवाएँ बनाई गयी | और ऐसे-ऐसे तथाकथित सूफी संतों को हमने उनके मरने के बाद “पीर” घोषित कर दिया, उनकी कबरों को पूजना शुरू कर दिया मानों हम सब एहसान मान रहे हो कि आपने कितना अच्छा किया हमारी माँ-बहन-बेटी के साथ बलात्कार करके | धिक्कार है उस हर हिंदू को जो कबर पर अपना सिर पटकता है और माँगता है संतान, सुख, धन, वैभव | ये धन, वैभव माँगते उनसे, – जो कभी फटीचर थे, भिखारी थे, मंगेतर थे, दर-दर भटकने वाले या दुराचारी, अत्याचारियों से – अपने लिए माँगना कितनी शर्म और लज्जा की बात है | कृपा कर इससे बचें | हमारे हिंदू भाई कबर से संतान माँगते हैं, उस लाश से जो वर्षों पहले जमीन के अंदर गाड़ दी गयी थी और अब उसके शरीर का रक्त, हड्डी व वीर्य किसी का नमूना भी नहीं मिल सकता | संतान तो किसी चेतन से ही माँगनी चाहिए पर हम हिंदू तो कही भी, कभी भी, किसी से भी व कुछ भी माँग लेते हैं | जरा विचार करें |
  • मृत्यु दिवस मनाना :- हमारी संस्कृति के अनुसार हम महापुरुषों का जन्म दिवस मानते हैं कभी भी किसी महापुरुष का मृत्यु दिवस नहीं मनाते | हमारे सारे त्यौहार आनंद व प्रसन्नता के हैं, कोई ऐसा त्यौहार नहीं जिसमें हम रुदन, दुःख प्रकट करते हैं, पर मुस्लिम सभ्यता के प्रभाव में रह-रह कर हमने भी कुछ-कुछ सीख ही लिया | आज हिंदू समाज का कोई-कोई वर्ग अपने संत-महंत का मृत्यु दिवस, पुण्यतिथि के नाम पर मनाने लगा है | क्या कभी आपने श्री कृष्ण जी या मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम कि मृत्यु तिथि सुनी ??? राम नवमी या कृष्ण अष्टमी उनकी जन्म तिथि का उत्सव है | गुरु नानक जयंती, महावीर जयंती, बुद्ध जयंती ये सब जन्म तिथियाँ ही हैं | हमारी परंपरा जन्म जयंती मनाने कि है न कि मृत्यु तिथि | कृपा कर ध्यान दें और इस बुराई से बचें |
  • स्त्री सम्मान :- हमारे शास्त्र बताते है कि स्त्री का सम्मान करों | शास्त्र कहता है कि “जहाँ नारी कि पूजा अर्थात् सम्मान होता है वह घर, परिवार, समाज, राष्ट्र सुखी होता है और वह देवता रहते हैं” | लेकिन आज उल्टा हो रहा हैं | मुस्लिम प्रभाव में आ कर हम सब स्त्री का सम्मान नहीं कर रहे और सब दुखी है | आइये ! नारी का सम्मान करें |
  • लोबान :- पहले के समय में मंदिरों में अगर-तगर-गुग्गुल आदि सुगन्धित पदार्थ जलाये जाते थे पर आज मुस्लिम प्रभाव में हिंदू लोबान का प्रयोग करने लगे हैं  | यज्ञ कुंड कि जगह लोबान जलाने के पात्र ने ले ली है | आइये ! आज से ही यज्ञ कुंड का प्रयोग करें और लोबान पात्र का नहीं | सुगन्धित पदार्थ में सामग्री का प्रयोग करें, गुग्गुल, अगर-तगर का प्रयोग करें ना कि लोबान का |
  • पाँच बार कि नमाज :- नकलची हिंदुओं ने मुस्लिमों से पाँच बार कि नमाज कि तरह आरती भी सीख ली है | कई मंदिरों में दिन के अलग-अलग  समय आरती होती है और उसको नाम दिया जाता है – शयन आरती, भोग आरती, मंगल आरती आदि | ईश्वर सोता ही नहीं तो फिर कैसे शयन आरती ? खाता ही नहीं तो फिर कैसे भोग आरती ? सबको जगाने वाले के लिए मंगल आरती क्यों ? आइये ! इससे बचें | संध्या, वंदन दो समय किया जाता है – सबरे और शाम |

 

अपने आप को मुस्लिम प्रभाव से बचाने का प्रयास करें और अन्यों को समझायें | धन्यवाद |

 

क्‍या भारत सही मायने में धर्म-निरपेक्ष हैं

 

 

 डॉ0 संतोष राय की कलम से

 क्या भारत सही मायने में धर्मनिरपेक्ष है? क्या भारत संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों  को मानता है? क्या भारत मे हिंदू और मुस्लिम लोगों  और उनके नेताओं  के बीच भेद-भाव नही किया जाता? यदि हाँ, तो फिर राहुल गाँधी का सबसे करीबी दोस्त और यूपीए का सांसद असदुद्दीन ओबैसी भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन हमास और हिजबुल्लाह के खूंखार कमांडरों के साथ बार बार मिलने लेबनान के बेरुत और दहिल्या शहर मे क्यों जाता है?

इजरायल के चेतावनी की अनदेखी

 

 

  ओवैसी हिजबुल्‍ला आतंकवादी के साथ

सूत्रों से ज्ञात हुआ की इजराइली ख़ुफ़िया एजेन्सी मोसाद ने भारत सरकार को कई बार पत्र लिखकर कहा है कि आपका सांसद जो आपकी यूपीए सरकार को समर्थन दे रहा है वो इजरायल में  आतंकवाद फैला रहा है और साथ ही भारत के गरीब मुस्लिम युवकों  का ब्रेनवाश करके उन्हें हमास और हिजबुल्लाह के लिए भर्ती करता है, लेकिन चूँकि भारत की यूपीए सरकार को सिर्फ हिंदू ही आतंकवादी नजर आते है इसलिए भारत सरकार ओबैसी को खुलेआम छुट दे दिया है। ज्ञात रहे कि हिजबुल्लाह आज विश्व का सबसे बड़ा आत्मघाती दस्ते वाला आतंकवादी संगठन है जो छोटे-छोटे बच्चों  को अपने आत्मघाती दस्ते मे भर्ती करता है।

 

 

 

मुस्लिमों ने कैसे धर्म निरपेक्ष देशों को मुस्लिम राष्‍ट्र बनाया

 ओवैसी लेबनान में

पूर्व में लेबनान पहले धर्मनिरपेक्ष देश था और वहाँ ४% हिंदू और १०% यहूदी भी रहते थे। लेबनान जहां पहले ८०% ईसाई तथा अन्य धर्म और २०% मुस्लिम रहते थे और लेबनान विश्व का बहुत तेजी से तरक्की करता हुआ मुल्क था, इसकी राजधानी बेरुत को विश्व का गोल्ड केपिटल कहा जाता था क्योकि बेरुत विश्व की सबसे बड़ी सोने की मण्डी थी। इतना ही नहीं  खूबसूरत लेबनान में  कई हॉलीवुड और बॉलीवुड  के फिल्मों  की शूटिंग होती थी।

 

  ओवैसी लेबनान में 

 

लेकिन लेबनान की तरक्की और खुशहाली पर लेबनान के मुस्लिम नेताओं ने ग्रहण लगा दिया, मस्जिदों में और अपने सम्मेलनों के मुसलमानों को खूब बच्चे पैदा करके लेबनान पर कब्‍जा  करने की बाते करते थे| फिर धीरे-धीरे लेबनान का जनसंख्या का संतुलन बिगड़ गया और फिर लेबनान 25 सालों से गृहयुद्ध की चपेट मे आ गया | आज लेबनान के दो हिस्से है उत्तरी लेबनान जिसमें  ईसाई और अन्य धर्मों  के लोग रहते है और दक्षिण लेबनान जहां मुस्लिम रहते है उसी तरह राजधानी बेरुत का भी दो अघोषित हिस्सा है जहां एक तरह ईसाई और दूसरी तरफ मुस्लिम रहते हैं|

 

सांसदों को विदेश यात्रा से पूर्व अनुमति का नियम

 

जब भी कोई सांसद विदेश यात्रा करता है तो उसे लोकसभा सचिव को लिखित सूचना देकर अनुमति लेनी पड़ती है भले ही वो उसकी निजी यात्रा ही क्यों न हो| एक आरटीआई के जबाब मे मीरा कुमार ने पहले बताया कि उनके पास ऐसी कोई फ़ाइल नही आई जिसमे ओबैसी ने लेबनान और सीरिया के यात्रा की अनुमति मांगी हो |इसका मतलब यही है कि ओवैसी ने बिना अनुमति के विदेश यात्रा की। सवाल ये उठता है कि आखिर इतना घोर साम्प्रदायिकता फ़ैलाने वाला ओबैसी को यूपीए साम्प्रदायिक क्यों नही मानती है ?

ओबैसी के डिप्‍लोमेटिक पासपोर्ट में गांधी परिवार की भूमिका

 

 ओवैसी राहुल गांधी के साथ 

सबसे बड़ा चौकने वाला खुलासा ये है कि ओबैसी को डिप्लोमेटिक पासपोर्ट राहुल गाँधी की सिफारिश पर मिला था जबकि खुद आन्ध्रप्रदेश की कांग्रेस सरकार की ही ख़ुफ़िया पुलिस ने ओबैसी को डिप्लोमेटिक पासपोर्ट न देने की रिपोर्ट भेजी थी लेकिन जब राहुल गाँधी ने इस मामले मे हस्तक्षेप किया जब जाकर विदेश मंत्रालय ने ओबैसी को बिना किसी योग्यता-अर्हता के डिप्लोमेटिक पासपोर्ट जारी कर दिया |

 
   ओवैसी सोनिया गांधी के साथ

 ध्‍यान रहे कि साधारण पासपोर्ट का कलर नीला होता है जबकि डिप्लोमेटिक पासपोर्ट का कलर मैरून होता है। और तो और डिप्लोमेटिक पासपोर्ट रखने वाले व्यक्ति की किसी भी हवाई अड्डे पर तलाशी नही होती और इन्हें “वीजा आन अराइवल” की भी सुविधा होती है और ये पासपोर्ट केवल राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केबिनेट स्तर के मंत्री और राज्यों में  मुख्यमन्त्रियों  और राजदूत तथा दूतावास में सचिव स्तर के अधिकारियों को ही जारी हो सकता है |

बांग्‍लादेशी  मुसलमानों का पुर्नवास क्‍यों

 

 ओवैसी राहुल गांधी के साथ 

अभी कुछ दिन पहले संसद में  आसाम पर चर्चा के दौरान ओबैसी ने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की उपस्थिति मे कहा कि “यदि भारत सरकार आसाम मे मुसलमानों का चाहे वो प्रवासी क्यों न हो ठीक ढंग से पुनर्वास नही करती और उन्हें उचित मुवावजा नही देती तो फिर भारत का मुसलमान इस देश की ईंट से ईंट बजा देंगे” लेकिन किसी भी सांसद ने ओबैसी के इस बयान की निंदा नही की | इससे बड़ा राष्ट्र का अपमान और क्या हो सकता है की पक्ष व विपक्ष दोनों ही इस मुद्दे पर चुप रहे और तो और मीडिया ने भी इसको ब्रेकिंग न्यूज़ नही बताया सिर्फ टाइम्स नाउ ने ही इस खबर पर चर्चा की|

यूपीए की नजर में हिन्‍दू

यूपीए  की नजर मे सिर्फ भारत के हिंदू ही साम्प्रदायिक है | अगर कोई भारत मे हिंदू हित की बात करेगा तो वो घोर साम्प्रदायिक और राजनितिक रूप से अछूत बन जायेगा | पूरी मीडिया और कई राजनितिक दल सहित कुछ तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अपनी दूकान चलाने वाली छोटी पार्टियां सब उसको साम्प्रदायिक घोषित कर देंगे | लेकिन यदि कोई सिर्फ मुस्लिम हित की ही बात करेगा तो वो धर्मनिरपेक्ष माना जायेगा |

ओवैसी की नजर में मुस्लिम ही नागरिक

 

 

ओवैसी ने आज तक संसद में सिर्फ मुस्लिम हित और मुस्लिमों  के बारे मे ही मुद्दे उठाये हैं  और वे सिर्फ मुस्लिम लोगों  की ही मदद करते है यहाँ तक कि आसाम में  भी उन्होंने जब राहत शिविर लगाया तो उसके उपर लिख दिया Only for Muslims” ।

इन्होंने सानिया मिर्जा को कई बार सम्मानित किया लेकिन जब एक पत्रकार ने इनसे पूछा कि आप सानिया नेहवाल को कब सम्मानित करेंगे तो ये महाशय माइक फेंक दिये |

आईबी ने दंगों के लिये ओबैसी बंधुओं को जिम्‍मेदार माना

आंध्र प्रदेश की कांग्रेस सरकार की ही आईबी हैदराबाद में  भड़के कई दंगों के लिए ओबैसी बंधुओ को जिम्मेदार बताती है यहाँ तक की केन्द्र की ख़ुफ़िया एजेंसियों ने भी कई बार गृहमंत्रालय को ओबैसी के संदिग्ध गतिबिधियों के बारे मे चेतावनी दी है |लेकिन सब बेकार |

 

 

ABOUT THE NAME “HINDU”

Posted: December 5, 2012 in tRuTH Of LigHt

I feel there needs to be some clarification about the use of the words “Hindu” and “Hinduism.” The fact is that true “Hinduism” is based on Vedic knowledge, which is related to our spiritual identity. Many people do accept it to mean the same thing as Sanatana-dharma, which is a more accurate Sanskrit term for the Vedic path. Such an identity is beyond any temporary names as Christian, Muslim, Buddhist, or even Hindu. After all, God never describes Himself as belonging to any such category, saying that He is only a Christian God, or a Muslim God, or a Hindu God. That is why some of the greatest spiritual masters from India have avoided identifying themselves only as Hindus. The Vedic path is eternal, and therefore beyond all such temporary designations. So am I calling the name “Hindu” a temporary designation?

We must remember that the term “hindu” is not even Sanskrit. Numerous scholars say it is not found in any of the Vedic literature. So how can such a name truly represent the Vedic path or culture? And without the Vedic literature, there is no basis for “Hinduism.”

Most scholars feel that the name “Hindu” was developed by outsiders, invaders who could not pronounce the name of the Sindhu River properly. According to Sir Monier Williams, the Sanskrit lexicographer, you cannot find an indigenous root for the words Hindu or India. Neither are these words found in any Buddhist or Jain texts, nor any of the official 23 languages of India. Some sources report that it was Alexander the Great who first renamed the River Sindhu as the Indu, dropping the beginning “S”, thus making it easier for the Greeks to pronounce. This became known as the Indus. This was when Alexander invaded India around 325 B.C. His Macedonian forces thereafter called the land east of the Indus as India, a name used especially during the British regime. Before this, the Vedic name for the area was Bharath Varsha, which many people still prefer to call it by that name.

Later, when the Muslim invaders arrived from such places as Afghanistan and Persia, they called the Sindhu River the Hindu River. Thereafter, the name “Hindu” was used to describe the inhabitants from that tract of land in the northwestern provinces of India where the Sindhu River is located, and the region itself was called “Hindustan.” Because the Sanskrit sound of “S” converts to “H” in the Parsee language, the Muslims pronounced the Sindhu as “hindu,” even though at the time the people of the area did not use the name “hindu” themselves. This word was used by the Muslim foreigners to identify the people and the religion of those who lived in that area. Thereafter, even the Indians conformed to these standards as set by those in power and used the names Hindu and Hindustan. Otherwise, the word has no meaning except for those who place value on it or now use it out of convenience.

            This is corroborated and explained further by Sarjerao Ramrao Gharge-Deshmukh, where he explains, “At the juncture of the Greek invasion, the noun Hindu had not yet evolved. The natives were [known as] the Vedic people who followed the practices prescribed in the Vedas where fire worship was prominent among other forces of nature, such as Indra (rains), Varun (water), Vayu (wind), Ashva (horse), etc. As a religion, Islam was formalized around 622 AD and the Persian conquest of 642-44 AD by the Arabs as Islamic power destroyed the age-old Persian civilization in terms of philosophy, culture, type of worship, etc. Within 100 years of the Arabic conquest, the Persians were overwhelmingly converted to Islam. At this juncture, due to Persian interchangeability between ‘s’ and ‘h’, Sindu must have become Hindu and the Persians called their brothers across the river as Hindus and the abode of the Hindus as Hindusthan. Nehru in his book titled Discovery of India also states that the earliest reference to the term Hindu was found in the Tantrik literatures of the 8th century AD. Thus, relatively speaking, Hindu is the modern term for the Vedic Indians by the Persians who had lost their ancient civilization to the Arabs.” (Ramayana: A Fact or Fiction?, by Sarjerao Ramrao Gharge-Deshmukh, Pratibha Deshmukh, Pune, October, 2003, p.236)

Another view of the name “Hindu” shows the confusing nature it causes for understanding the true essence of the spiritual paths of India. As written by R. N. Suryanarayan in his bookUniversal Religion (p.1-2, published in Mysore in 1952), “The political situation of our country from centuries past, say 20-25 centuries, has made it very difficult to understand the nature of this nation and its religion. The western scholars, and historians, too, have failed to trace the true name of this Brahmanland, a vast continent-like country, and, therefore, they have contented themselves by calling it by that meaningless term ‘Hindu’. This word, which is a foreign innovation, is not made use by any of our Sanskrit writers and revered Acharyas in their works. It seems that political power was responsible for insisting upon continuous use of the word Hindu. The word Hindu is found, of course, in Persian literature. Hindu-e-falak means ‘the black of the sky’ and ‘Saturn’. In the Arabic language Hind not Hindu means nation. It is shameful and ridiculous to have read all along in history that the name Hindu was given by the Persians to the people of our country when they landed on the sacred soil of Sindhu.”

The location wherein the word “Hindu” occurs for what some people feel the first time is in the Avesta of the Iranians in its description of the country of India and its people. As their state religion of Zoroastrianism grew, the word seemed to take on a derogatory meaning. And of course as Islam spread in India, the words “Hindu” and “Hindustan” became even more disrespected and even hated in the Persian arena, and more prominent in the Persian and Arabic literature after the 11th century.

Another view of the source of the name Hindu is based on a derogatory meaning. It is said that, “Moreover, it is correct that this name [Hindu] has been given to the original Aryan race of the region by Muslim invaders to humiliate them. In Persian, says our author, the word means slave, and according to Islam, all those who did not embrace Islam were termed as slaves.” (Maharishi Shri Dayanand Saraswati Aur Unka Kaam, edited by Lala Lajpat Rai, published in Lahore, 1898, in the Introduction)

Furthermore, a Persian dictionary titled Lughet-e-Kishwari, published in Lucknow in 1964, gives the meaning of the word Hindu as “chore [thief], dakoo [dacoit], raahzan [waylayer], andghulam [slave].” In another dictionary, Urdu-Feroze-ul-Laghat (Part One, p. 615) the Persian meaning of the word Hindu is further described as barda (obedient servant), sia faam (black color) and kaalaa (black). So these are all derogatory expressions for the translation of the term hindu in the Persian label of the people of India.

So, basically, Hindu is merely a continuation of a Muslim term that became popular only within the last 1300 years. In this way, we can understand that it is not a valid Sanskrit term, nor does it have anything to do with the true Vedic culture or the Vedic spiritual path. No religion ever existed that was called “Hinduism” until the Indian people in general placed value on that name, as given by those who dominated over them, and accepted its use. Furthermore, the term has been used to convey demeaning connotations. So is it any wonder that some Indian acharyas and Vedic organizations do not care to use the term?

The real confusion started when the name “Hinduism” was used to indicate the religion of the Indian people. The words “Hindu” and “Hinduism” were used frequently by the British with the effect of focusing on the religious differences between the Muslims and the people who became known as “Hindus”. This was done with the rather successful intention of creating friction among the people of India. This was in accord with the British policy of divide and rule to make it easier for their continued dominion over the country.

However, we should mention that others who try to justify the word “Hindu” present the idea that rishis of old, several thousand years ago, also called central India Hindustan, and the people who lived there Hindus. The following verse, said to be from the Vishnu PuranaPadma Purana and the Bruhaspati Samhita, is provided as proof, yet I am still waiting to learn the exact location where we can find this verse:

 

Aaasindo Sindhu Paryantham Yasyabharatha Bhoomikah

Mathrubhuh Pithrubhoochaiva sah Vai Hindurithismrithaah

 

Another verse reads as: Sapta sindhu muthal Sindhu maha samudhram vareyulla Bharatha bhoomi aarkkellamaano Mathru bhoomiyum Pithru bhoomiyumayittullathu, avaraanu hindukkalaayi ariyappedunnathu. Both of these verses more or less indicate that whoever considers the land of Bharatha Bhoomi between Sapta Sindu and the Indian Ocean as his or her motherland and fatherland is known as Hindu. However, here we also have the real and ancient name of India mentioned, which is Bharata Bhoomi. “Bhoomi” (or Bhumi) means Mother Earth, but Bharata is the land of Bharata or Bharata-varsha, which is the land of India. In numerous Vedic references in the PuranasMahabharata and other Vedic texts, the area of India is referred to as Bharata-varsha or the land of Bharata and not as Hindustan. The name Bharata-varsha certainly helps capture the roots and glorious past of the country and its people.

Another couple of references that are used, though the exact location of which I am not sure, includes the following:

 

Himalayam Samaarafya Yaavat Hindu Sarovaram

 Tham Devanirmmitham desham Hindustanam Prachakshathe

 

Himalyam muthal Indian maha samudhram vareyulla

devanirmmithamaya deshaththe Hindustanam ennu parayunnu

These again indicate that the region between the Himalayas and the Indian Ocean is called Hindustan. Thus, the conclusion of this is that all Indians are Hindus regardless of their caste and religion. Of course, not everyone is going to agree with that.

Others say that in the Rig Veda, Bharata is referred to as the country of “Sapta Sindhu”, i.e. the country of seven great rivers. This is, of course, acceptable. However, exactly which book and chapter this verse comes from needs to be clarified. Nonetheless, some say that the word “Sindhu” refers to rivers and sea, and not merely to the specific river called “Sindhu”. Furthermore, it is said that in Vedic Sanskrit, according to ancient dictionaries, “sa” was pronounced as “ha”. Thus “Sapta Sindhu” was pronounced as “Hapta Hindu”. So this is how the word “Hindu” is supposed to have come into being. It is also said that the ancient Persians referred to Bharat as “Hapta Hind”, as recorded in their ancient classic “Bem Riyadh”. So this is another reason why some scholars came to believe that the word “Hindu” had its origin in Persia.

Another theory is that the name “Hindu” does not even come from the name Sindhu. Mr. A. Krishna Kumar of Hyderabad, India explains. “This [Sindhu/Hindu] view is untenable since Indians at that time enviably ranked highest in the world in terms of civilization and wealth would not have been without a name. They were not the unknown aborigines waiting to be discovered, identified and Christened by foreigners.” He cites an argument from the book Self-Government in India by N. B. Pavgee, published in 1912. The author tells of an old Swami and Sanskrit scholar Mangal Nathji, who found an ancient Purana known as Brihannaradi in the Sham village, Hoshiarpur, Punjab. It contained this verse:

 

himalayam samarabhya yavat bindusarovaram

hindusthanamiti qyatam hi antaraksharayogatah

 

Again the exact location of this verse in the Purana is missing, but Kumar translates it as: “The country lying between the Himalayan mountains and Bindu Sarovara (Cape Comorin sea) is known as Hindusthan by combination of the first letter ‘hi’ of ‘Himalaya’ and the last compound letter ‘ndu’ of the word ‘Bindu.’”

This, of course, is supposed to have given rise to the name “Hindu”, indicating an indigenous origin. The conclusion of which is that people living in this area are thus known as “Hindus”.

So again, in any way these theories may present their information, and in any way you look at it, the name “Hindu” started simply as a bodily and regional designation. The name “Hindu” refers to a location and its people and originally had nothing to do with the philosophies, religion or culture of the people, which could certainly change from one thing to another. It is like saying that all people from India are Indians. Sure, that is acceptable as a name referring to a location, but what about their religion, faith and philosophy? These are known by numerous names according to the various outlooks and beliefs. Thus, they are not all Hindus, as many people who do not follow the Vedic system already object to calling themselves by that name. So “Hindu” is not the most appropriate name of a spiritual path, but the Sanskrit term of Sanatana-dharma is much more accurate. The culture of the ancient Indians and their early history is Vedic culture or Vedic dharma. So it is more appropriate to use a name that is based on that culture for those who follow it, rather than a name that merely addresses the location of a people.

It seems that only with the Vedic kings of the Vijayanagara empire in 1352 was the word “Hindu” used with pride by Bukkal who described himself as “Hinduraya suratrana”. Whereas the main Sanskrit texts, and even the rituals that have been performed in the temples from millennia ago, used the word “Bharata” in reference to the area of present-day India. Thus, it is traditionally and technically more accurate to refer to the land of India as “Bharata” or “Bharat varsha”.

Unfortunately, the word “Hindu” has gradually been adopted by most everyone, even the Indians, and is presently applied in a very general way, so much so, in fact, that now “Hinduism” is often used to describe anything from religious activities to even Indian social or nationalistic events. Some of these so-called “Hindu” events are not endorsed in the Vedic literature, and, therefore, must be considered non-Vedic. Thus, not just anyone can call themselves a “Hindu” and still be considered a follower of the Vedic path. Nor can any activity casually be dubbed as a part of Hinduism and thoughtlessly be considered a part of the true Vedic culture.

Therefore, the Vedic spiritual path is more precisely called Sanatana-dharma, which means the eternal, unchanging occupation of the soul in its relation to the Supreme Being. Just as thedharma of sugar is to be sweet, this does not change. And if it is not sweet, then it is not sugar. Or the dharma of fire is to give warmth and light. If it does not do that, then it is not fire. In the same way, there is a particular dharma or nature of the soul, which is sanatana, or eternal. It does not change. So there is the state of dharma and the path of dharma. Following the principles ofSanatana-dharma can bring us to the pure state of regaining our forgotten spiritual identity and relationship with God. This is the goal of Vedic knowledge and its system of self-realization. Thus, the knowledge of the Vedas and all Vedic literature, such as Lord Krishna’s message in Bhagavad-gita, as well as the teachings of the Upanishads and Puranas, are not limited to only “Hindus” who are restricted to a certain region of the planet or family of birth. Such knowledge is actually meant for the whole world. As everyone is a spiritual being and has the same spiritual essence as described according to the principles of Sanatana-dharma, then everyone should be given the right and privilege to understand this knowledge. It cannot be held for an exclusive group or region of people.

Sanatana-dharma is also the fully developed spiritual philosophy that fills whatever gaps may be left by the teachings of other less philosophically developed religions. Direct knowledge of the soul is a “universal spiritual truth” which can be applied by all people, in any part of the world, in any time in history, and in any religion. It is eternal. Therefore, being an eternal spiritual truth, it is beyond all time and worldly designations. Knowledge of the soul is the essence of Vedic wisdom and is more than what the name “Hindu” implies, especially after understanding from where the name comes.

Even if the time arrives in this deteriorating age of Kali-yuga after many millennia when Christianity, Islam, Buddhism, and even Hinduism (as we call it today) may disappear from the face of the earth, there will still be the Vedic teachings that remain as a spiritual and universal truth, even if such truths may be forgotten and must be re-established again in this world by Lord Krishna Himself. I doubt then that He will use the name “Hindu.” He certainly said nothing of the sort when He last spoke Bhagavad-gita.

Thus, although I do not feel that “Hindu” is a proper term to represent the Vedic Aryan culture or spiritual path, I do use the word from time to time to mean the same thing since it is already so much a part of everyone’s vocabulary. Otherwise, since I follow the Vedic path of Sanatana-dharma, I call myself a Sanatana-dharmist. That reduces the need to use the label of “Hindu” and also helps focus on the universal nature of the Vedic path. Therefore, I propose that all those who consider themselves to be Hindus begin to use this term Sanatana-dharmist, which not only refers to the correct Sanskrit terminology, but also more accurately depicts the true character and spiritual intention of the Vedic path. Others have also used the terms Sanatanis or evenDharmists, both of which are closer to the real meaning within Vedic culture.

However, for political and legal purposes it may be convenient to continue using the name Hindu for the time being. Until the terms Sanatana-dharma or Vedic dharma become more recognized by international law and society in general, “Hindu” may remain the term behind which to rally for Vedic culture. But over the long term, it is a name that is bound to change in meaning to the varying views of it due to its lack of a real linguistic foundation. Being based merely on the values people place in it, its meaning and purpose will vary from person to person, culture to culture, and certainly from generation to generation. We can see how this took place with the British in India. So there will be the perpetuation of the problems with the name and why some people and groups will not want to accept it.

Yet by the continued and increased use of the terms Vedic dharma or Sanatana-dharma, at least by those who are more aware of the definitive Sanskrit basis of these terms, they will gain recognition as being the more correct terminology. It merely takes some time to make the proper adjustments.

This is the way to help cure the misinterpretation or misunderstandings that may come from using the name “Hindu,” and also end the reasons why some groups do not care to identify themselves under that name. After all, most Vedic groups, regardless of their orientation and the specific path they follow, can certainly unite behind the term Vedic dharma.

 

APPENDIX: Srila Prabhupada, founder of the International Society of Krishna Consciousness, has said different things at different times or to different people regarding the use of the name “Hindu”. Many times members of Iskcon seem to think that the name Hindu should be avoided at all costs. And on numerous occasions Srila Prabhupada did say Iskcon members are not necessarily Hindus.

However, he succinctly explains to Janmanjaya and Taradevi in a letter from Los Angeles of July 9th, 1970 that there is a connection between Hinduism and Krishna Consciousness: “Regarding your questions: Hindu means the culture of the Indians. India happens to be situated on the other side of the Indus River which is now in Pakistan which is spelled Indus–in Sanskrit it is called Sindhu. The sindhu was misspelled by the Europeans as Indus, and from Indus the word ‘Indian’ has come. Similarly the Arabians used to pronounce sindhus as Hindus. This [thus] Hindus is spoken as Hindus. It is neither a Sanskrit word nor is it found in the Vedic literatures. But the culture of the Indians or the Hindus is Vedic and beginning with the four varnas and fourashramas. So these varnas and four ashramas are meant for really civilized human race. Therefore the conclusion is actually when a human being is civilized in the true sense of the term he follows the system of varna and ashrama and then he can be called a ‘Hindu’. Our Krishna Consciousness Movement is preaching these four varnas and four ashramas, so naturally it has got some relationship with the Hindus. So Hindus can be understood from the cultural point of view, not religious point of view. Culture is never religion. Religion is a faith, and culture is educational or advancement of knowledge.”

He further says in a letter from Los Angeles, July 16th, 1970, wherein he answers questions for a Nevatiaji: “9. The Americans are very intelligent and qualified boys and girls so they understand the principles as genuine and thus they accept them. They understand that Krishna Consciousness Movement is neither Indian nor Hindu, but it is a cultural movement for the whole human society although of course because it is coming from India it has [an] Indian and Hindu touch.”

In this way, Srila Prabhupada differentiated Krishna Consciousness as a universal, cultural and spiritual movement that could stand on its own, apart from any particular religious and cultural distinction. Yet he still relates how there is certainly an Indian and Hindu relationship with what is being presented within his movement. And this does not have to be nor should it be completely ignored or avoided. We can certainly work together for the preservation and promotion of Vedic culture without difficulty with those who may prefer to call themselves Hindu, knowing our connection with the Vedic traditions.

To start with, the Manu-samhita clearly and logically recommends that, “Meatcan never be obtained without injury to living creatures, and injury tosentient beings is detrimental to the attainment of heavenly bliss; let himtherefore shun the use of meat. Having well considered the disgusting origin offlesh and the cruelty of fettering and slaying corporeal beings, let himentirely abstain from eating flesh.” (Manu-samhita 5.48-49)

However, it is not simply the person who eats the meat that becomes implicatedby eating the dead animal, but also those who assist in the process. “He whopermits the slaughter of an animal, he who cuts it up, he who kills it, he whobuys or sells meat, he who cooks it, he who serves it up, and he who eats it,must all be considered as the slayers of the animal. There is no greater sinnerthan that man who though not worshiping the gods or the ancestors, seeks toincrease the bulk of his own flesh by the flesh of other beings.” (Manu-samhita5.51-52)

As we get further into the Manu-samhita, there are warnings that becomeincreasingly more serious. For example, “If he has a strong desire (for meat)he may make an animal of clarified butter or one of flour (and eat that); butlet him never seek to destroy an animal without a (lawful) reason. As manyhairs as the slain beast has, so often indeed will he who killed it without a(lawful) reason suffer a violent death in future births.” (Manu-samhita5.37-38)

In this way, the only time to carry out the need to kill animals forconsumption is when there is an emergency such as when there simply is nothingelse to eat. Otherwise, when there are plenty of grains, vegetables, fruits,etc., to eat, it is only mankind’s lust and selfish desires that motivate oneto kill other beings to satisfy one’s tongue by tasting their blood and flesh,or to fatten one’s wallet by making money from participating in thedistribution or the cooking of meat. Such violent actions create oppositereactions. For this reason the warnings are given, “He who injures harmlesscreatures from a wish to give himself pleasure, never finds happiness in thislife or the next.” (Manu-samhita 5.45)

Nonetheless, there are also benefits that are mentioned that a person can attainsimply by not eating the bodies of other creatures: “By subsisting on purefruits and roots, and by eating food fit for ascetics in the forest, one doesnot gain so great a reward as by entirely avoiding the use of flesh. Me he [mamsah] will devour in the next world, whose flesh I eat in this life; the wisedeclare this to be the real meaning of the word ‘flesh’ [mam sah].”(Manu-samhita 5.54-55)

“He who does not seek to cause the sufferings of bonds and death to livingcreatures, (but) desires the good of all (beings), obtains endless bliss. Hewho does not injure any (creature) attains without an effort what he thinks of,what he undertakes, and what he fixes his mind on.” (Manu-samhita 5.46-47)

Also, “By not killing any living being, one becomes fit for salvation.”(Manu-samhita 6.60)

The earlier texts, such as the Rig-veda (10.87.16), also proclaim the need togive up the eating of slaughtered animals. “One who partakes of human flesh,the flesh of a horse or of another animal, and deprives others of milk byslaughtering cows, O King, if such a fiend does not desist by other means, thenyou should not hesitate to cut off his head.”

“Those who are ignorant of real dharma and, though wicked and haughty, accountthemselves virtuous, kill animals without any feeling of remorse or fear ofpunishment. Further, in their next lives, such sinful persons will be eaten bythe same creatures they have killed in this world.” (Bhagavata Purana 11.5.14)

The following verses are from the Tirukural:

Howcan he practice true compassion who eats the flesh of an animal to fatten hisown flesh?
Riches cannot be found in the hands of the thriftless, nor can compassion befound in the hearts of those who eat meat.

He who feasts on a creature’s flesh is like he who wields a weapon. Goodness isnever one with the minds of these two.

If you ask, “What is kindness and what is unkindness?”
It is not-killing and killing. Thus, eating flesh is never virtuous. Life is perpetuatedby not eating meat.The jaws of Hell close on those who do. If the world did notpurchase and consume meat, no one would slaughter and offer meat for sale. Whena man realizes that meat is the butchered flesh of another creature, he willabstain from eating it.

Insightful souls who have abandoned the passion to hurt others will not feed onflesh that life has abandoned. Greater than a thousand ghee offerings consumedin sacrificial fires is to not sacrifice and consume any living creature. Alllife will press palms together in prayerful adoration of those who refuse toslaughter or savor meat.

From these verses there should be no doubt that the Vedic shastra recommendsthat such selfish meat-eating must be given up if one has any concern for otherliving beings, or one’s own future existence, or for attaining any spiritualmerit.

There are also references in the Mahabharata that forewarn the activity ofeating flesh. This is in the Anushasana Parva section where there is aconversation between Yudhisthira and Grandfather Bhishma about the merits ofabstaining from meat eating and the demerits and consequences for doing so. Itis quite revealing. One quote is: “He who desires to augment his own flesh byeating the flesh of other creatures, lives in misery in whatever species he maytake his [next] birth.” (Mahabharata, Anu.115.47)

“The purchaser of flesh performs violence by his wealth; he who eats flesh doesso by enjoying its taste; the killer does violence by actually tying andkilling the animal. Thus, there are three forms of killing. He who brings fleshor sends for it, he who cuts off the limbs of an animal, and he who purchases,sells, or cooks flesh and eats it–all these are to be considered meat-eaters.”(Mahabharata, Anu.115.40) All of these people will also incur the same karmic reactionsfor their participation in killing, distributing or eating the flesh ofanimals, as explained next.

“The sins generated by violence curtail the life of the perpetrator. Therefore,even those who are anxious for their own welfare should abstain frommeat-eating.” (Mahabharata, Anu.115.33)

A more thorough and educational rendering of the teachings of Bhishma in theMahabharata is as follows:

Bhishma started, “Numberless discourses took place between the Rishis on thissubject, O scion of Kuru’s race. Listen, O Yudhisthira, what their opinion was.(115.7)

“The highly wise seven celestial Rishis, the Valakshillyas, and those Rishiswho drink the rays of the sun, all speak highly of abstention from meat. Theself-created Manu has said that the man who does not eat meat, or who does notkill living creatures, or who does not cause them to be killed, is a friend ofall creatures. Such a man is incapable of being oppressed by any creature. Heenjoys the confidence of all living beings. He always enjoys the praise of thepious. The virtuous Narada has said that that man who wishes to multiply hisown flesh by eating the flesh of other creatures meets with disaster.(115.9-12)

“That man, who having eaten meat, gives it up afterwards wins merit by such adeed that is so great that a study of all the Vedas or a performance, OBharata, of all the sacrifices [Vedic rituals], cannot give its like. (115.16)

“That learned person who gives to all living creatures the gift of completeassurance is forsooth regarded as the giver of lifebreaths in this world.(115.18)

“Men gifted with intelligence and purified souls should always treat others asthey themselves wish to be treated. It is seen that even those men who areendued with learning and who seek to acquire the greatest good in the shape ofliberation, are not free of the fear of death. (115.20)

“What necessity be said of those innocent and healthy creatures gifted withlove of life, when they are sought to be killed by sinful wretches living byslaughter? Therefore, O King, know that the discarding of meat is the highestrefuge of religion, of the celestial region, and of happiness. Abstention ofinjury [to others] is the highest religion. It is, again, the highest penance.It is also the highest truth from which all duty emanates. (115.21-23)

“Flesh cannot be had from grass or wood or stone. Unless a living creature iskilled it cannot be procured. Hence is the fault of eating flesh. Thecelestials who live upon Svaha, Svadha, and nectar, are given to truth andsincerity. Those persons, however, who are for satisfying the sensation oftaste, should be known as Rakshasas [flesh-eating demons] pervaded by thequality of Darkness. (115.24-25)

“If there were nobody who ate flesh, then there would be nobody to slay livingcreatures. The man who slays living creatures kills them for the sake of theperson who eats flesh. If flesh were not considered as food, there would thenbe no destruction of living creatures. It is for the sake of the eater that thedestruction of living entities is carried on in the world. Since, O you ofgreat splendor, the period of life is shortened by persons who kill livingcreatures or cause them to be killed, it is clear that the person who seeks hisown good should give up meat altogether. Those dreadful persons who are engagedin the destruction of living beings never find protectors when they are inneed. Such persons should always be molested and punished even as beast ofprey. (115.29-32)

“That man who seeks to multiply his own flesh by (eating) the flesh of othershas to live in this world in great anxiety, and after death has to take birthin indifferent races and families. High Rishis given to the observance of vowsand self-control have said that abstention from meat is worthy of praise,productive of fame and Heaven, and a great satisfaction itself. This I heardformerly, O son of Kunti, from Markandeya when that Rishi discoursed on thesins of eating flesh. (115.34-36)

“He who purchases flesh, kills living creatures through his money. He who eatsflesh, kills living beings through his eating. He who binds or seizes andactually kills living creatures is the slaughterer. These are the three sortsof slaughter through each of these acts. He who does not himself eat flesh butapproves of an act of slaughter, becomes stained with the sin of slaughter.(115.38-39)

“That wretched man who kills living creatures for the sake of those who wouldeat them commits great sin. The eater’s sin is not as great. That wretched manwho, following the path of religious rites and sacrifices as laid down in theVedas, would kill a living creature from a desire to eats its flesh, willcertainly go to hell. That man who having eaten flesh abstains from itafterwards acquires great merit on account of such abstention from sin. He whoarranges for obtaining flesh, he who approves of those arrangements, he whokills, he who buys or sells, he who cooks, and he who eats it, [acquire the sinof those who] are all considered as eaters of flesh. [Therefore] that man whowishes to avoid disaster should abstain from the meat of every living creature.(115.44-48)

“Listen to me, O king of kings, as I tell you this, O sinless one, there isabsolute happiness in abstaining from meat, O king. He who practices severeausterities for a century, and he who abstains from meat, are both equallymeritorious. This is my opinion. (115.52-53)

“Yudhisthira said: Alas, those cruel men who, not caring for various othersorts of food, want only flesh, are really like great Rakshasas [meat-eatingdemons]. (116.1)

“Bhishma said: That man who wishes to increase his own flesh by the meat ofanother living creature is such that there is none meaner and more cruel thanhe. In this world there is nothing that is dearer to a creature than his life.Hence, one should show mercy to the lives of others as he does to his own life.Forsooth, O son, flesh has its origin in the vital seed. There is great sinattached to its eating, as, indeed, there is merit in abstaining from it.(116.11-13)

“There is nothing, O delighter of the Kurus, that is equal in point of merit,either in this world or in the next, to the practice of mercy to all livingcreatures. (116.19)

“Hence a person of purified soul should be merciful to all living creatures.That man, O king, who abstains from every kind of meat from his birth forsooth,acquires a large space in the celestial region. They who eat the flesh ofanimals who are desirous of life, are themselves [later] eaten by the animalsthey eat. This is my opinion. Since he has eaten me, I shall eat him in return.This, O Bharata, forms the character as Mamsah [meaning flesh] of Mamsah [mehe, or “me he” will eat for having eaten him]. The destroyer is always slain.After him the eater meets with the same fate. (116.32-35)

“He who acts with hostility towards another becomes victim of similar deedsdone by that other. Whatever acts one does in whatever bodies, he has to sufferthe consequences thereof in those bodies. (116.36-37)

“Abstention from cruelty is the highest Religion. Abstention from cruelty isthe greatest self-restraint. Abstention from cruelty is the highest gift.Abstention from cruelty is the highest penance. Abstention from cruelty is thehighest sacrifice. Abstention from cruelty is the highest power. Abstentionfrom cruelty is the greatest friend. Abstention from cruelty is the greatesthappiness. (116.38-39)

“Gifts made in all sacrifices [rituals], ablutions performed in all sacredwater, and the merit which one acquires from making all kinds of giftsmentioned in the scriptures, all these do not equal in merit abstention fromcruelty.” (116.40)

THE QUESTION OF WHETHER LORD RAMA ATE MEAT IN THE RAMAYANA

Sometimes the idea comes up that the Ramayana indicates that Lord Rama ate meat, especially while He was in exile in the woods. However, there is no verse in Valmiki’s Ramayana that establishes that Lord Rama, Lakshmana or Sita ate meat while in or even out of exile. In fact, it seems to show that He very much disliked the notion of eating meat. The evidence for this is as follows:

The verse that comes in question in this regard in the Valmiki Ramayana, Sundarakanda, Skanda 36, Sloka 41, says: “Na mamsam Raghava bhunkte, na chaiva madhu sevate, Vanyam suvihitam nityam bhaktamsnati panchamam.”

The literal translation of this verse is: “Sri Rama does not take meat or honey. He partakes everyday of wild fruits and boiled (wild) rice fully sanctioned (for an ascetic) in the evening.”

Faulty English translations have put it as something like this: Hanuman to Sita, “When you were away, Sri Rama did not even take deer meat.” This incorrectly implies that Rama normally may have ate meat but did not do so while Sita was away from Him.

Now in this verse, the Sanskrit word bhunkte is a verb that means strong desire for eating. It comes from the Sanskrit bhaksha, which means voracious eating. When you say Na bhunkte, as we see in the line that says “Na mamsam Raghava bhunkte”, it gives a complete negative connotation, meaning that Lord Rama abhorred meat-eating. On the other hand, if the words were “Na mamsam Raghavo khadate”, it could then mean that Raghava may have engaged in meat eating before, but had stopped it at this point. However, this is not what is said, but is where some English translations present a similar confusion, or are simply unclear about this issue. Nonetheless, by analyzing the correct view of the proper translation, it indicates clearly that the Valmiki Ramayana shows how Lord Rama not only did not eat meat, but greatly disliked it

Deception by Translators of the Quran:-

 
 
 
       Those who master the Arabic language, and who have read the Quran in the original Arabic, are usually stunned when they read it translated into a foreign language. They can’t help but notice that there are numerous discrepancies between the original Arabic and the translation.
 
       Careful examinations would lead one to discern that these are not merely routine human errors. Analytical thinking uncovers the reality that the discrepancies are part of a deliberate, intentional plot to deceive. The translator’s objective is to distract the foreign readers and prospective converts from the CRUELTIES andPREJUDICES of the Quran.
 
       Certain words, concepts and phrases in the original Arabic Quran sound strange to foreign readers.Arabic speaking Muslims have become accustomed to them. However, when one attempts accurate literal translation of these, the result is rather shocking.
One will have in hand a book that contains strange expressions and vulgar language. What was supposed to be a“holy” book would become X-rated, unsuitable for family-oriented use and children reading material.
 
       Muhammadan Muslim translators facing this dilemma, found themselves in a position demanding meticulous cleverness. It would take a lot of patching and polishing to make their translations of the Quranread as a “holy” book should. Their aim is to present the outside world a version of the Quran that would attract people to Islam rather than repel them from it.
 
       The intentional MISTRANSLATION of the Quran is a massive subject that needs to be explored and dealt with in a separate thesis. For the purpose of this article we will give just a few examples before zeroing in on the topic of this article.
 
Here are some of the interesting things Islam and Sharia Law says about deception/scheming. Many people might not be aware of these.
 
 
The Iraqi Information minister quoted Sura 3:54, saying that
“Allah was the best of deceivers”. What actually is this word?
 
3:54        “And (then unbelievers) plotted and planned [makaroo] and Allah too planned [makara]and the best [khayr] of planners [makireen] is Allah
 
       #393        The Arabic Makara has both a bad and a good meaning, that of making an intricate plan to carry out some secret purpose. The enemies of Allah are constantly doing that. But Allah-in whose hands is all good-has His plans also, against which the evil ones will have no chance whatever.
 
        The Arabic word makara means to DECEIVE, PLAN, PLOT, SCHEME.
 
       *** The Quran depicts Allah as a SLY, DECEIVING & CUNNING SCHEMER who plans and plots against his own CREATION that he had already PREDESTINED to end up either inParadise or in Hell.                
 
       Such human attributes cannot possibly fit any supreme being, if Allah is the same as theGod of Israel.
       
       In fact such attributes are pure BLASPHEMY ***
 
       The Arabic Bible in Genesis 3:1 uses the same word for Satan.
 
        However, the Vand Dyck and Jerusalem Bibles use the root word hayala, which means toDECEIVE or to LIE.
 
 
       This word “schemer” (makir) is a very strong word which Wehr and Abdel-Nour define as “sly, cunning, wily, deceiver”.
 
       The Arabic-Arabic unjid defines it with “khuda`a” which means exactly the same thing 
(Bill Campbell in his book The Qur’an and the Bible in the Light of History and Science p.217-218).
 
       Another reference to the DECEIT of Allah:
 
7:99        Did they then fell secure against the plan [makr] of Allah?  But no one can feel secure from theplan [makr] of Allah except those (doomed) to ruin!
 
 
       The phrase of Allah “being the best deceiver”. “khayr-ol- makireen” is also used of Allah inSuras 8:30; 10:21.
 
8: 30        Remember how the unbelievers plotted [yamkuroo] against thee to keep thee in bonds or slay thee or get thee out (of thy home).  They plot and plan [yamkuroona] and Allah too plans[yamkuroo] but the best of planners [ khayr- ol-makireen] is Allah.
 
10:21        When We make mankind taste of some mercy after adversity hath touched them Behold! they take to plotting [makaroo] against our Signs! Say: “Swifter to plan [asra’oo makiran] is Allah!”  Verily Our messengers record all the plots that ye make [tamkuroona] !
 
       Allah is the most DECEITFUL in Sura 3:54 and in Sura 30:8
 
       In sura 10:21 Allah is referred to be the fastest in DECEIT/ PLOTTING/ SCHEMING.
 
       The root with its nine forms is used  in the Quran 43 times.
 
English translations of the Quran try to conceal the true meaning of “deceiver”
 
Yusuf Ali  3:54“And (the unbelievers) Plotted and planned, And Allah too planned, And the best[khayr] of planners Is Allah.
 
       *** Yusuf Ali, in his version of the Quran, says that Makara can be “good or
bad”,  positive or negative, (note 393), but all the Arabic dictionaries do not show the ‘good’side ***
 
Arberry Sura 3:between 45 and 50” And they devised, and God [Allah] devised, and God [Allah] is the best [khayr] of devisers
 
Malik  3:54 “The (unbelievers among the children of Israel) plotted (against Isa) and Allah also devised a plan (to raise him up), and Allah is the best [khayr] in planning.”
 
10:21 “When we bestow mercy upon the people, after adversity had afflicted them, they immediatelyscheme against our revelations! Say, “GOD’s [Allah’s] scheming is far more effective. For our messengers are recording everything you scheme. (http://www.submission.org/suras/sura10.html)
 
Pickthall 3:54 “And they (the disbelievers) schemed, and Allah schemed (against them); and Allah is the best [khayr] of schemers.
 
Maulawi Sher Ali, an Ahmaddiyya 3:54 “And they planned, and Allah also planned; and Allah is the Best of planners.”
 
 
       In Farsi, the word, “Makr” and “Makar” is from the Arabic, and it is invariably negative. 
 
 
Interpretation of Sura 3:54-
 
       The person who is a Makir (Same form as the word Kafir), speaking of
the attribute of a person, is one who would outwit someone else to cause them harm.
 
        It speaks of one who would reveal the opposite of what he plans to do. The reality is that he is scheming evil for that person. Hence there is the sense of planning and scheming but mostly it means to trick, outwitand deceive for the purpose of overpowering and conquering the other.
 
       Makir is one who devises a secret scheme against someone else. Synonyms would be cheating, defrauding, double-crossing, deceiving, tricking, in all cases Makara has the sense ofdefeating the one you have tricked.
 
       Although Quranic verses are rarely understood in the context of verses that surround them, the best explanation of this verse is that some Jews were trying to deceive Jesus into believing that they have accepted his message while in reality were plotting to have him excuted.
 
       Unfortunately for them, Allah  knew of their scheme because they cannot outwit Allah, and he in turnschemed to deceive them by having a Jesus look-alike get executed instead.
 
       So the literal translation that best represents the intention of the verse is
 
Sura 3:54 “… and (they) Deceived and Allah Deceived and Allah is the deceivest of deceivers “
 
In Arabic: “Wa makaru wa makara Allah wa Allah khayru^l Makireen.
 
       The context of the story is very important since Sura 3 is regarded to be Muhammad’s  understanding ofChristian beliefs.
 
        Al Tabari says here, that the deceit of Allah applies to the time when the Jews wanted to kill Isa the son of Miriam [Mary]. In order not to have Jesus killed, someone else had the face of Isa put on him so he was killed instead of Isa the son of Miriam [Mary]. This is how Allah deceived the Jews.
 
        *** If Jesus did not DIE on the CROSS, then obviuosly there could have been noRESURRECTION.
 
       Without Death Resurrection, there in no purpose for Christianity. Hence with one single sentence, the whole of Christianity is OBLITERATED.
 
       Since according to the Quran, its verses were ‘revealed’ by the angel Gabriel, the same who predicted the miraculous birth of Jesus as the REDEEMER of humanity, then AllahDECEIVED the Christians TWICE:
 
       Once for the reason of Jesus’s birth and then for his non death.
 
       From all of the above, the true nature of Allah is revealed ***
 
 
The Hadiths-
 
Sahih Al-Bukhari HadithHadith 3.857        Narrated byUm Kulthum bint Uqba
That she heard Allah’s Apostle saying, “He who makes peace between the people by inventing good information or saying good things, is not a liar.”
 
       *** Telling ‘flattering’ lies to make peace is acceptable ***
 
 
Sahih Al-Bukhari HadithHadith 3.687        Narrated byJabir bin Abdullah
Allah’s Apostle said, “Who would kill Ka’b bin Al-Ashraf as he has harmed Allah and His Apostle ?”Muhammad bin Maslama (got up and) said, “I will kill him.” So, Muhammad bin Maslama went to Ka’b and said, “I want a loan of one or two Wasqs of food grains.” Ka’b said, “Mortgage your women to me.” Muhammad bin Maslama said, “How can we mortgage our women, and you are the most handsome among the Arabs?” He said, “Then mortgage your sons to me.” Muhammad said, “How can we mortgage our sons, as the people will abuse them for being mortgaged for one or two Wasqs of food grains? It is shameful for us. But we will mortgage our arms to you.” So, Muhammad bin Maslama promised him that he would come to him next time. They (Muhammad bin Maslama and his companions) came to him as promised and murdered him. Then they went to the Prophet and told him about it.
 
 
Sahih Al-Bukhari HadithHadith 4.271        Narrated byJabir
The Prophet said, “Who is ready to kill Ka’b bin Ashraf (i.e. a Jew).” Muhammad bin Maslama replied, “Do you like me to kill him?”
The Prophet replied in the affirmative.
Muhammad bin Maslama said, “Then allow me to say what I like.”
The Prophet replied, “I do (i.e. allow you).”
 
       *** Maslama needed permission from Muhammad to use DECEPTION and SUBTERFUGE in order to murder al Ashraf.
 
       Muhammad sanctioned it without hesitation ***
 
Sunan of Abu-DawoodHadith 2631        Narrated byKa’b ibn Malik
When the Prophet (peace be upon him) intended to go on an expedition, he always pretended to be going somewhere else, and he would say: War is deception.
 
 
Allah Deceives Even Muslims-
 
Sahih Al-Bukhari HadithHadith 8.577        Narrated byAbu Huraira
Some people said, “O Allah’s Apostle! Shall we see our Lord on the Day of Resurrection?” He said, “Do you crowd and squeeze each other on looking at the sun when it is not hidden by clouds?” They replied, “No, Allah’s Apostle.” He said, “Do you crowd and squeeze each other on looking at the moon when it is full and not hidden by clouds?” They replied, -No, O Allah’s Apostle!” He said, “So you will see Him (your Lord) on the Day of Resurrection. Similarly Allah will gather all the people and say, ‘Whoever used to worship anything should follow that thing.’ So, he who used to worship the sun, will follow it, and he who used to worship the moon will follow it, and he who used to worship false deities will follow them; and then only this nation (i.e., Muslims) will remain, including their hypocrites.
 
Allah will come to them in a shape other than they know and will say, ‘I am your Lord.’ They will say, ‘We seek refuge with Allah from you. This is our place; (we will not follow you) till our Lord comes to us, and when our Lord comes to us, we will recognize Him.’
 
Then Allah will come to them in a shape they know and will say, ‘I am your Lord.’ They will say, ‘(No doubt) You are our Lord,’ and they will follow Him. …”
( Also in Bukhari 9.532 & Muslim 1.349)
 
 
       *** A Muhammadan could point out that the word “deceive” is not present in the quote above; Allah did not speak any lying words, and this occurs in Heaven, not on earth.
 
        However, it is not required that the word “deceives” be used to deceive people, as whenAllah impersonated one who is not Allah since those who believed Allah’s words when Allahchose to be in this false shape, would end up  in Hell.
 
       If this is not deception, then what is?
 
       We can all agree that this hadith teaches that at a future time Allah will deliberately misrepresent himself to Muslims in a
“shape other than they know” ***
 
 
       What is Allah’s shape? I have not (yet) heard a Muslim say, but here is what Bukhari vol.9:532 tells us.
 
Sahih Al-Bukhari HadithHadith 9.532B        Narrated byAbu Said Al Khudri
We said, “O Allah’s Apostle! Shall we see our Lord on the Day of Resurrection?”
He said, “Do you have any difficulty in seeing the sun and the moon when the sky is clear?”
We said, “No.”
He said, “So you will have no difficulty in seeing your Lord on that Day as you have no difficulty in seeing the sun and the moon (in a clear sky).”
The Prophet then said, “Somebody will then announce, ‘Let every nation follow what they used to worship.’ So the companions of the cross will go with their cross, and the idolators (will go) with their idols, and the companions of every god (false deities) (will go) with their god, till there remain those who used to worship Allah, both the obedient ones and the mischievous ones, and some of the people of the Scripture. Then Hell will be presented to them as if it were a mirage.
Then it will be said to the Jews, ‘What did you use to worship?’
They will reply, ‘We used to worship Ezra, the son of Allah.’
It will be said to them, ‘You are liars, for Allah has neither a wife nor a son. What do you want (now)?’ They will reply, ‘We want You to provide us with water.’ Then it will be said to them ‘Drink,’ and they will fall down in Hell (instead).
 
       *** Muhammad, his Quran and the Hadiths are unreserved PATHOLOGICAL LIARSbecause no follower of Muhammad, Past, Present or in the Future can point out a SINGLEverse in the Hebrew Bible wherein the first MONOTHEISTS in the world, the Israelites or theJews, could have believed or declared that God has a son called EZRA.
 
       It was afterall according to the Gospels, that Jesus was condemned to DEATH because he allegedly  declared himself the SON of GOD ***
 
Then it will be said to the Christians, ‘What did you use to worship?’
They will reply, ‘We used to worship Messiah, the son of Allah.’ It will be said, ‘You are liars, for Allah has neither a wife nor a son. What: do you want (now)?’ They will say, ‘We want You to provide us with water.’ It will be said to them, ‘Drink,’ and they will fall down in Hell (instead). When there remain only those who used to worship Allah (Alone), both the obedient ones and the mischievous ones, it will be said to them, ‘What keeps you here when all the people have gone?’ They will say, ‘We parted with them (in the world) when we were in greater need of them than we are today, we heard the call of one proclaiming, ‘Let every nation follow what they used to worship,’ and now we are waiting for our Lord.’
 
Then the Almighty will come to them in a shape other than the one which they saw the first time, and He will say, ‘I am your Lord,’ and they will say, ‘You are not our Lord.’ And none will speak to Him then but the Prophets, and then it will be said to them, ‘Do you know any sign by which you can recognize Him?’
They will say. ‘The Shin,’ and so Allah will then uncover His Shin whereupon every believer will prostrate before Him and there will remain those who used to prostrate before Him just for showing off and for gaining good reputation. These people will try to prostrate but their backs will be rigid like one piece of a wood (and they will not be able to prostrate). Then the bridge will be laid across Hell.” We, the companions of the Prophet said, “O Allah’s Apostle! What is the bridge?”
 
       *** Hence, despite what Muhammadan Muslims might say today, Bukhari says that Allahwill have a true PHYSICAL form and Allah himself will also appear to Muslims in a false physical form, as a sort of  temptation to them.
 
       In contrast
 
James 1:13 “When tempted, no one should say, ‘God is tempting me.’ For God cannot be tempted by evil, nor does he tempt anyone.”
 
       The Quran’s Allah has been given human, mortal and fallible attributes that are not worthy of any Almighty DIVINITY ***