हिंदुओं कि दुर्दशा और पिटने का रहस्य…!

Posted: December 29, 2012 in tRuTH Of LigHt
“डेरा इस्माइल खान नगर में एक शैख़युसूफ की खानकाह है | जिससे सैकड़ों हिन्दू स्त्री-पुरुष मुरादें मांगने जाते हैं | वहाँ के मुजावर (पुजारी) प्रथम मुख पर थूकते हैं, पुनः जूते लगाते हैं | एक बार डेरा में कुछ हिन्दू मुझसे पूछने लगे कि वह थूकते तो हैं परन्तु जूते क्यों लगाते हैं | मैंने कहा कि थूकते इसलिए हैं कि तुम परमात्मा पारब्रह्म को छोड़ कर कबर पर सिर रगड़ने आए | क्यों कि थूक शीघ्र सुख जाती है अतः जूते भी लगाते हैं जिससे तुम शीघ्र से भूल न जाओ |
अल्ह्जर ऐ कौमे नादां अल्हजर |
अर्थात् ईश्वर से डर ऐ मुर्ख जाति !! ईश्वर से डर |”
ऊपर का प्रसंग पण्डित लेखराम जी पुस्तक कुलियात आर्य मुसाफिर में पृष्ठ २०९ में मिलता हैं |
लगभग ७० वर्ष पुराना यह प्रसंग है पर स्थिति वही कि वही है हमारे हिन्दू भाइयों कि | आज भी पिट रहे हैं मुसलामानों से, माथा पटकते हैं तो कबर के ऊपर | चढावा चढाते हैं तो दरगाह पर, मस्जिद, कबर के ऊपर फिर रोते हैं लव-जिहाद, आतंकवाद, हज-सब्सिडी आदि आदि पर |
  • ·   ये हिन्दू मुर्ख कभी अजमेर जायेंगे तो ख्वाजा नवाज की दरगाह जरुर जायेंगे – कभी भूल कर भी ऋषि उद्यान जा कर महर्षि दयानन्द को विनयांजलि नहीं देते, विचार-प्रेरणा नहीं लेते |
  • ·     ये हिन्दू मुर्ख कभी दिल्ली जाते हैं तो “हजरत मटके शाह बाबा कलंदर रहमतुल्लाह पीर” के ऊपर मटका चढाते हैं पर कभी गुरुद्वारा शीशगंज नहीं जाते, भोग नहीं लगाते, शबद नहीं सुनते, लंगर नहीं खाते | जिस गुरु ने हमारे धर्म को बचाने के लिए अपने शीश कटाया था उसे कभी याद नहीं करते |
  • दिल्ली जा कर हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह जरुर जायेंगे पर कभी भाई मतिदास को याद नहीं करते |

·     ये हिन्दू मुर्ख कभी बम्बई जाते हैं तो संत तुकाराम जी के मंदिर नहीं जाते पर मुल्ला साईं बाबा के दर्शन करेंगे | संत तुकाराम जी का स्थान देहु मुम्बई के पास है और शिरडी दूर फिर भी साईं को पूजेंगे | पूजेंगे भी और पिटेंगे भी | इस साईं बाबा ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया था जबकि साईं-बाबा के समकालीन रानी लक्ष्मी बाई जी ने अपना जीवन-राज-पाट सब अर्पण कर दिया था |

·     ये हिन्दू मुर्ख कभी झाँसी जायेंगे तो जाकर जीवन शाह की मजार जायेंगे पर रानी लक्ष्मी बाई को याद नहीं करेंगे |
प्रभु !! इस हिन्दू जाति को बुद्धि दो, स्वाभिमान दो, प्रेरणा दो, वेद-पथ पर चले और राम-कृष्ण-शंकर-हनुमान-व्यास-वशिष्ठ के अनुगामी बनें |

 

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